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अनुष्ठान पर कहानियाँ

दीवाली के दीये

सआदत हसन मंटो

"इस कहानी में इंसान की उम्मीदें और इच्छाएं पूरी न होने का बयान है। छत की मुंडेर पर दीये जल रहे हैं। एक छोटी बच्ची, एक जवान, एक कुम्हार, एक मज़दूर और एक फ़ौजी एक के बाद एक आते हैं। सब अपनी अपनी सोच में गुम हैं, दीये सबको चुप-चाप देखते हैं और फिर एक-एक करके बुझ जाते हैं।"

शादी

अहमद अली

यह कहानी एक ऐसे शख़्स की है, जो पाँच साल तक पश्चिमी सभ्यता में पला-बढ़ा है। उसने वहाँ के साहित्य को पढ़ा और समाज में पूरी तरह रच बस गया है। जब वह हिंदुस्तान लौटता है तो परिवार वाले उसकी शादी करने के लिए कहते हैं मगर वह बिना देखे, मिले किसी लड़की से शादी करने पर राज़ी नहीं होता। तीन साल तक ना-नूकुर करने के बाद आख़िर-कार वह मान ही जाता है। शादी होने के बाद वह अनजान होने पर बीवी के पास जाने से कतराता है। फिर एक रात तन्हा लेटे हुए कुछ नॉवेल के हिस्से याद आते हैं और वह अपनी बीवी की चाहत में तड़प उठता है और उसके पास चला जाता है।

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