अपने वतन की छोड़ के मिट्टी नहीं गए
अच्छे वही रहे जो कराची नहीं गए
पराए देस में रहते हैं इक ज़माने से
हमारा दिल मगर अब भी वतन में रक्खा है
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मिरा ख़ून-ए-जिगर तो गुल्सिताँ के काम आया है
बताऊँ किस तरह आख़िर बयाबानों पे क्या गुज़री