आज के चुनिन्दा 5 शेर

वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है

अजीब शख़्स है पानी के घर में रहता है

बिस्मिल साबरी
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अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे

how do I hide the obvious, which from my face is clear

as you wish me to be seen, how do I thus appear

how do I hide the obvious, which from my face is clear

as you wish me to be seen, how do I thus appear

वसीम बरेलवी

आँखें खुलीं तो जाग उठीं हसरतें तमाम

उस को भी खो दिया जिसे पाया था ख़्वाब में

as my eyes did ope my yearnings did rebound

for I lost the person who in my dreams I found

as my eyes did ope my yearnings did rebound

for I lost the person who in my dreams I found

सिराज लखनवी

हम से क्या हो सका मोहब्बत में

ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की

फ़िराक़ गोरखपुरी
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कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल

वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए

बहादुर शाह ज़फ़र
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आज का शब्द

ज़ाहिद

  • zaahid
  • زاہد

शब्दार्थ

hermit, devotee, abstinent, religious devout

ज़ाहिद की तरह ख़ुश्क मुसलमाँ नहीं 'जलील'

इश्क़-ए-बुताँ भी दिल में है याद-ए-ख़ुदा भी है

शब्दकोश

क्या आप जानते हैं?

Yadon

"यादों की बरात" उर्दू के मशहूर शायर शब्बीर हसन ख़ां जोश मलीहाबादी (1898-1982) की प्रसिद्ध और विवादित लेकिन दिलचस्प आत्म कथा है। यह उनकी निरंतर छः वर्षों की मेहनत का परिणाम है जिसमें उन्होंने अपनी सत्तर वर्षीय जीवन के सर्द-गर्म और सियाह-सफ़ेद का वर्णन किया है। यह किताब सात सौ चव्वालीस पृष्ठों पर आधारित 1970 में प्रकाशित हुई।
इस किताब में शामिल कुछ घटनाएं और विशेषकर उनके प्रेम प्रसंग वाले अध्याय के संदर्भ में किसी ने उसे कहानीकारी कहा, किसी ने गप्पबाज़ी। दिलचस्प बात ये है कि किताब के आरंभ में जोश ने अपनी स्मृति की कमज़ोरी का उल्लेख करते हुए कहा है,"मैं कभी अच्छी याददाश्त का मालिक नहीं रहा। अगर मेरी ज़िंदगी के किसी घटना में कमी बेशी नज़र आए तो उसे मेरा ऐच्छिक कर्म न समझें, मुझे माफ़ कर दें।"
इस आत्म कथा में जोश ने अपनी बुराइयों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं की है। यह किताब दस्तावेज़ी बयानों का संग्रह न सही, लेकिन संस्कृति और  सभ्यता से एक युग का भरपूर परिचय कराती है। यह जीवनी जोश की रचनात्मक शैली का उत्कृष्ट नमूना है। समानार्थी और समान ध्वनि शब्दों की तकरार, उपमा और प्रतीकों की अधिकता किताब में शामिल किसी चीज़, घटना या किसी दृश्य को जैसे जगमगा देती है।

आर्काइव

आज की प्रस्तुति

महफ़िल से उठाने के सज़ा-वार हमीं थे

सब फूल तिरे बाग़ थे इक ख़ार हमीं थे

पूर्ण ग़ज़ल देखें

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बशीर बद्र

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