आज के चुनिन्दा 5 शेर

जान देना नहीं किसे मंज़ूर

तू किसी काम से तो आएगा

मुज़्तर ख़ैराबादी
  • शेयर कीजिए

क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़

क्या नहीं है मुझे ईमान अज़ीज़

मिर्ज़ा ग़ालिब

मौत से क्यूँ इतनी वहशत जान क्यूँ इतनी अज़ीज़

मौत आने के लिए है जान जाने के लिए

why this dread of death and why life be held so dear

death is meant to come and life- meant to disappear

why this dread of death and why life be held so dear

death is meant to come and life- meant to disappear

अज्ञात

बे-पिए चैन नहीं होश नहीं जान नहीं

शौक़ काहे को मरज़ है मुझे मय-ख़्वारी का

जलील मानिकपूरी
  • शेयर कीजिए
आज का शब्द

दिल-गीर

  • dil-giir
  • دِلگِیر

शब्दार्थ

melancholy

गो दिल में ख़फ़ा है तू पर इस बात को नादाँ

कह बैठियो मत आशिक़-ए-दिल-गीर के मुँह पर

शब्दकोश

Quiz A collection of interesting questions related to Urdu poetry, prose and literary history. Play Rekhta Quiz and check your knowledge about Urdu!

Which poet heavily comprised ''Asliyat, Sadgi and Josh'' in to his works?
Start Today’s Quiz

Rekhta App : World’s largest collection of Urdu poetry

क्या आप जानते हैं?

फ़ना

अपने ज़माने में मुशायरों के बहुत ही मशहूर शायर फ़िना निज़ामी कानपुरी(1922-1988) ने अपना काव्य संग्रह इसलिए नहीं छपवाया था कि अगर उनकी सारी ग़ज़लें सबकी नज़रों में आजाएंगी तो जब मुशायरों में जाऊंगा तो श्रोता नई ग़ज़ल की फ़रमाइश करेंगे तो हर मुशायरे में नई ग़ज़ल कहां से लाएंगे। फ़िना निज़ामी का जादूई तरन्नुम, शगुफ़्ता कलाम और आकर्षक व शानदार शख़्सियत मुशायरे लूट लेती थी। मुशायरे ही उनके आय का श्रोत थे। उनका यह शे'र बहुत मशहूर है;
तर्क ए ताल्लुक़ात को इक लम्हा चाहिए
लेकिन तमाम उम्र मुझे सोचना पड़ा
वह बहुत मज़हबी थे, लम्बी सी दाढ़ी रखते थे, हमेशा शेरवानी पहनते थे लेकिन अश्आर में शराब का ज़िक्र ख़ूब होता था। कराची में एक मुशायरा पढ़ने गए थे वहां उन्होंने यह शे'र पढ़ा;
मैं शराबी नहीं हूं शायर हूं
इस्तिलाहन शराब पीता हूं
जोश मलीहाबादी भी मौजूद थे, वो एक दम ग़ुस्से में खड़े हो गए और यह मिसरा पढ़ा;
मैं शराबी नहीं हूं मुल्ला हूं

क्या आप जानते हैं?

साक़ी

'बहराम की वापसी' यह कोई जासूसी उपन्यास नहीं बल्कि साक़ी फ़ारूक़ी(1936-2018) का काव्य संग्रह है। उन्होंने अपनी बेबाक आप बीती "आप बीती पाप बीती" के नाम से लिखी। उसमें उन्होंने ऐसी बातें लिखी हैं जो साधारणतया अदीब अपनी किताबों में नहीं लिखते। वह एक अद्वितीय, बेबाक शायर अदीब और आलोचक थे।
गोरखपुर (हिंदुस्तान) में पैदा हुए, कराची और बंगलादेश में रहे और फिर इंग्लैंड जाकर कम्प्यूटर प्रोग्रामर की ट्रेनिंग ली और वहीं बस गए। साक़ी फ़ारूक़ी अपनी शायरी और ज़िन्दगी में नित नई बातों और बेधड़क गुफ़्तगू करने के अंदाज़ से लोगों को चौंका देने के लिए मशहूर हैं। एक ज़माने में गले में मोटी सी माला पहने रहते थे।
उन्हें जानवरों से भी लगाव था। एक कछुआ पाला था,जब वह मर गया तो अपने ख़ूबसूरत लान में उसकी क़ब्र बनाई और नौहा भी लिखा। एक कुत्ता लाड़ प्यार से पाला तो कुत्तों के बारे में सारा साहित्य पढ़ डाला। दो बिल्ले पाले जिनमें से एक का नाम "शेर ख़ां" और एक का नाम "राम राज" रखा।

क्या आप जानते हैं?

शब्द 'पहर' और 'पहरेदार' का क्या संबंध है। प्राचीन भारत में समय नापने का पैमाना पहर हुआ करते थे। दिन रात के आठ पहर थे और हर पहर तीन घंटे का हुआ करता था।
हर पहर के दौरान पहरेदार चौकसी पर रहते थे और हर घंटा पूरा होने पर धातु के बने घंटे पर चोट दे कर ऐलान करते थे कि वह पहरे पर हैं और दूसरे यह भी पता चलता था कि समय क्या हुआ है।पहर संस्कृत शब्द प्रहर से बना है। अब तो पहरेदार के मायने केवल संतरी, रक्षक या चौकीदार रह गया है।
उर्दू शायरी में 'आठों पहर', 'रात का पिछला पहर' और 'सह पहर' का बहुत ज़िक्र रहता है।
सह पहर ही से कोई शक्ल बनाती है ये शाम
ख़ुद जो रोती है मुझे भी तो रुलाती है ये शाम
सह फ़ारसी में तीन को कहते हैं और दिन के तीसरे पहर को सह पहर भी कहते हैं।

क्या आप जानते हैं?

ख़्वाजा

मशहूर लेखक, पत्रकार और फ़िल्म निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास अपने बेबाक क़लम और अभिव्यक्ति के लिए जाने जाते हैं। उनकी उद्देश्यपूर्ण फ़िल्में और ब्लिट्ज अख़बार में उनके कालम इसके गवाह हैं। ब्लिट्ज से पहले वह 'बाम्बे क्रानिकल' में थे, जहां उन्हें फ़िल्मों की समीक्षा लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। क्या आप जानते हैं कि उन्होंने उसके लिए पहले लगभग तीन सौ देशी व विदेशी फ़िल्में देखीं।
व्ही शांताराम की फ़िल्म 'आदमी' 1939 की रिलीज़ की तारीख़ कई बार टाल दी गई। उस पर अब्बास ने लिखा कि शायद शांताराम का आदमी पूना से पैदल चलकर बंबई आ रहा है और ऐसा लगता है कि राह में थक कर किसी पेड़ के नीचे सो गया है। उस टिप्पणी से शांताराम बहुत नाराज़ हुए। लिहाज़ा जब 'आदमी' रिलीज़ हुई तो फ़िल्मी पत्रकार होने की हैसियत से ख़्वाजा को फ़िल्म देखने का पास नहीं भेजा गया, लेकिन अब्बास ने अपने पैसे ख़र्च कर के फ़िल्म 'आदमी' 18 बार देखी और फ़िल्म की प्रशंसा में सात कालम का लम्बा चौड़ा लेख लिखा।

क्या आप जानते हैं?

गुरुदत्त को उर्दू से बहुत मोहब्बत थी। उनकी फ़िल्मों में उर्दू ज़बान और उर्दू शायरी की बहुत सी ऐसी मिसालें मौजूद हैं जिसका असर आज भी फ़िल्म इंडस्ट्री में नज़र आता है।
उनकी फ़िल्म "प्यासा" जिसे मशहूर ब्रिटिश फ़िल्म स्कालर Laura Mulvey ने साइट एंड साउंड मैगज़ीन में दुनिया की दस बेहतरीन फ़िल्मों में शुमार किया है। उसका हीरो विजय यानी गुरुदत्त एक शायर ही की भूमिका  में है। साहिर ने सन् 1957 में बनी इस फ़िल्म के गाने लिखे थे जो यादगार हैं। उनकी एक पुरानी नज़्म "चकले" को भी थोड़ी सी रद्दोबदल के बाद गुरुदत्त ने फ़िल्म में शामिल किया था। अब्रार अलवी ने जिनका संबंध लखनऊ से था, उन्होंने बामुहावरा और आसान उर्दू में फ़िल्म के संवाद लिखे थे।
फ़िल्म के एक दृश्य में छोटी सी शे'री नशिस्त का माहौल बना हुआ है जिसमें कुछ शायर कलाम पढ़ रहे हैं।एक शायर जो मजाज़ की भूमिका और हुलिए में है, मजाज़ का यह शे'र पढ़ता है;
इस आलम ए कैफ़ ओ मस्ती में इस अंजुमन ए इरफ़ानी में
सब जाम बकफ़ बैठे ही रहे हम पी भी गए छलका भी गए
और शेरवानी टोपी पहने एक बुज़ुर्ग शायर उर्दू के क्लासिकी तरन्नुम के अंदाज़ में, जिगर मुरादाबादी का यह शे'र पढ़ते हैं;
काम आख़िर जज़्बा ए बेअख़्तियार आ ही गया
दिल कुछ इस सूरत से तड़पा उनको प्यार आ ही गया।

आज की प्रस्तुति

महत्वपूर्ण और लोकप्रिय पाकिस्तानी शायर/उस्ताद शायर बहज़ाद लखनवी के पोते

मैं ने कल ख़्वाब में आइंदा को चलते देखा

रिज़्क़ और इश्क़ को इक घर से निकलते देखा

पूर्ण ग़ज़ल देखें

रेख़्ता ब्लॉग

पसंदीदा विडियो
This video is playing from YouTube

मिर्ज़ा ग़ालिब

Ghalib's Letter On Corona

इस विडियो को शेयर कीजिए

ई-पुस्तकें

Kulliyat-e-Anwar Shaoor

अनवर शऊर 

2015 महाकाव्य

Mughal Tahzeeb

महबूब-उल्लाह मुजीब 

1965

Shumara Number-002

डॉ. मोहम्मद हसन 

1970 असरी अदब

Audhoot Ka Tarana

 

1958 नज़्म

Iqbal Dulhan

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी 

1908 शिक्षाप्रद

अन्य ई-पुस्तकें