आज के चुनिन्दा 5 शेर

कुछ नहीं चाहिए तुझ से मिरी उम्र-ए-रवाँ

मिरा बचपन मिरे जुगनू मिरी गुड़िया ला दे

नोशी गिलानी
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गुल के होने की तवक़्क़ो पे जिए बैठी है

हर कली जान को मुट्ठी में लिए बैठी है

मह लक़ा चंदा
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अनहोनी कुछ ज़रूर हुई दिल के साथ आज

नादान था मगर ये दिवाना कभी था

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
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एक के घर की ख़िदमत की और एक के दिल से मोहब्बत की

दोनों फ़र्ज़ निभा कर उस ने सारी उम्र इबादत की

ज़ेहरा निगाह

हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है

कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

अदा जाफ़री
आज का शब्द

ख़ारज़ार

  • KHaarzaar
  • خار زار

शब्दार्थ

Place full of thorns

यूँ गुज़रता है तिरी याद की वादी में ख़याल

ख़ारज़ारों में कोई बरहना-पा हो जैसे

शब्दकोश

Quiz A collection of interesting questions related to Urdu poetry, prose and literary history. Play Rekhta Quiz and check your knowledge about Urdu!

Considered to be the first ever prose writer, Khawaja Banda Nawaz Gaesu Daraz belonged to?
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क्या आप जानते हैं?

शब्द 'ग़रीब' के उर्दू में कितने मायने हैं। उर्दू और हिंदी में आम तौर पर इसका मतलब है मुफ़लिस लेकिन दाग़ ने इसे मिसकीन के मायने में भी अपने इस शे'र में किस तरह बांधा है:
पूछो जनाब दाग़ की हमसे शरारतें
क्या सर झुकाए बैठे हैं हज़रत ग़रीब से
अरबी में इसका अर्थ है अजीब या अनोखा जिसकी जड़ है तीन अक्षरीय शब्द अजब। अजीब ओ ग़रीब की तरकीब भी उर्दू में जानी पहचानी है। म्यूज़ियम को हम अजायबघर भी कहने लगे। लेकिन फ़ारसी में इसके मायने हैं अजनबी या परदेसी। 'ग़रीब उल वतन' यानी परदेसी, मुसाफ़िर, बेघरा उर्दू गद्य-पद्य में बहुत आम है। हफ़ीज़ जौनपुरी का यह शे'र बहुत मशहूर है:
बैठ जाता हूं जहां छांव घनी होती है
हाय क्या चीज़ ग़रीब उल वतनी होती है

आर्काइव

आज की प्रस्तुति

आधुनिक उर्दू आलोचना के संस्थापकों में शामिल हैं।

ख़याल जिन का हमें रोज़-ओ-शब सताता है

कभी उन्हें भी हमारा ख़याल आता है

पूर्ण ग़ज़ल देखें

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दाग़ देहलवी

हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़' : दाग़ देहलवी

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