आज के चुनिन्दा 5 शेर

अपनी मस्ती में बहता दरिया हूँ

मैं किनारा भी हूँ भँवर भी हूँ

तहज़ीब हाफ़ी

सुकून-ए-दिल के लिए इश्क़ तो बहाना था

वगरना थक के कहीं तो ठहर ही जाना था

फ़ातिमा हसन

घर भी है घर में सभी अपने भी हैं

हाँ मोहब्बत की मगर ख़्वाहिश कर

रशीद अफ़रोज़
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दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं

उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया

दाग़ देहलवी

ख़्वाबों के उफ़ुक़ पर तिरा चेहरा हो हमेशा

और मैं उसी चेहरे से नए ख़्वाब सजाऊँ

अतहर नफ़ीस
आज का शब्द

तजाहुल

  • tajaahul
  • تجاہل

शब्दार्थ

ignorance, connivance

उन्हें तो सितम का मज़ा पड़ गया है

कहाँ का तजाहुल कहाँ का तग़ाफ़ुल

शब्दकोश

Quiz A collection of interesting questions related to Urdu poetry, prose and literary history. Play Rekhta Quiz and check your knowledge about Urdu!

Whose poetry collection is Baqiyat-e-Fani?
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क्या आप जानते हैं?

शब्द पैमाना सुनते ही शराब के जाम का ख़्याल आता है लेकिन पैमाना सिर्फ़ मयख़ाने में ही नहीं बच्चों के स्कूल के बस्तों में भी मिलता है। वो कैसे?
क्योंकि दोनों का संबंध पैमाइश यानी नापने से है। "पैमाना" असल में किसी चीज़ की मात्रा, वज़न या लम्बाई चौड़ाई,मोटाई और तापमान आदि नापने के मानक उपकरण को कहते हैं।
बच्चे स्कूल के बस्ते में जो Scale रख कर ले जाते हैं उसको उर्दू में पैमाना कहते हैं और अक्सर उसको फ़ुटा भी कहा जाता है। अक्सर उससे बच्चों की पिटाई भी हो जाती है। किसी द्रव्य को नापने के लिए भी किसी बर्तन में डाला जाता है, उस बर्तन को पैमाना ही कहा जाता है। शराब को नाप कर डालने वाला बर्तन भी पैमाना कहा गया है जो उर्दू शायरी में कभी गर्दिश में रहता है, कभी छलकता है। सब्र का पैमाना छलकने के मायने हैं बर्दाश्त से ज़्यादा हो जाना और शराफ़त का पैमाना शराफ़त परखने के मायने में आता है।

क्या आप जानते हैं?

निदा

निदा फ़ाज़ली (1938-2016) जिनका असली नाम मुक़्तदा हसन फ़ाज़ली था शायर और फ़िल्मी गीतकार के रूप में तो बहुत मशहूर हैं ही लेकिन उन्होंने अपनी जीवनी भी बहुत अलग अंदाज़ में लिखी है।
"दीवारों के बाहर","दीवारों के बीच" उनकी दो आत्म कथात्मक रचनाएं हैं जिनमें वह एक सूत्रधार की तरह अपनी ज़िंदगी की कहानी बयान करते हैं। कहीं प्रथम पुरुष अर्थात "मैं" का इस्तेमाल नहीं किया है,हर जगह अपना तख़ल्लुस "निदा" उपन्यास के एक पात्र की तरह इस्तेमाल किया है। इन आत्म कथात्मक उपन्यासों के सारे पात्र अपने असली नामों के साथ साथ शामिल हैं, सारी घटनाएं वास्तविक हैं।
निदा फ़ाज़ली ने बड़ी बेबाकी से अपने परिवार, ग्वालियर में अपने बचपन और छात्र जीवन, बम्बई के अनुभवों व घटनाओं और प्रेम प्रसंगों के बारे में लिखा है और उतनी ही बेबाकी से दूसरे लोगों के बारे में भी लिखा है। उनमें साहित्य और फ़िल्मी दुनिया के बहुत से मशहूर नाम भी शामिल हैं, जिस पर उन में से कई लोग उनसे नाराज़ भी हो गए थे।

क्या आप जानते हैं?

मुईन

"मरने की दुआएं क्यों मांगूं जीने की तमन्ना कौन करे" मुईन अहसन जज़्बी (1912-2005) की यह मशहूर ग़ज़ल भारत-पाक की फ़िल्मों में दो बार गाई गई लेकिन दोनों बार उन्हें इसका क्रेडिट नहीं दिया गया।
सन् 1948 में बनी फ़िल्म "ज़िद्दी" के लिए किशोर कुमार ने यह ग़ज़ल गाई थी। इस्मत चुग़ताई के शौहर शाहिद लतीफ़ ने फ़िल्म बनाई थी और उसकी कहानी इस्मत चुग़ताई ने लिखी थी। सन् 1970 में यही ग़ज़ल हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में पाकिस्तान की फ़िल्म "चांद सूरज" में शामिल की गई और बहुत मशहूर हुई। फ़िल्म ज़िद्दी वाली ग़ज़ल में मतला शामिल नहीं था लेकिन पाकिस्तानी फ़िल्म में सितम ये किया गया कि उस ग़ज़ल के मतला में जज़्बी का तख़ल्लुस हटा दिया गया।
"दुनिया ने हमें छोड़ा जज़्बी हम छोड़ न दें क्यों दुनिया को" इस तरह गाया गया;
दुनिया ने हमें छोड़ा ऐ दिल हम छोड़ न दें क्यों दुनिया को
दुनिया को समझ कर बैठे हैं अब दुनिया दुनिया कौन करे
जज़्बी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उर्दू के प्रोफ़ेसर थे। उनके एक छात्र ने उनसे अपनी आटोग्राफ बुक पर उस ग़ज़ल का मतला लिखने की फ़रमाइश की तो उन्होंने बस इतना जवाब दिया था, "यह मेरी ग़ज़ल कहां है..."

क्या आप जानते हैं?

मुश्ताक़

क्या आप जानते हैं?

मजरूह

प्रसिद्ध प्रगतिशील शायर मजरूह सुल्तानपुरी ने जिगर मुरादाबादी के साथ कई मुशायरे पढ़े।1945 में मुम्बई के एक मुशायरे का ज़िक्र है कि जब मजरूह के नाम का ऐलान हुआ तो लोगों ने उन्हें बच्चा समझा, मगर जब मजरूह ने ग़ज़ल छेड़ी तो महफ़िल पर एक सन्नाटा सा छा गया। मजरूह ने बड़े आत्म विश्वास के साथ शे'र सुनाए और मुशायरे को लूट लिया। मुशायरे में शामिल जिगर मुरादाबादी और हसरत मोहानी ने जी खोल कर दाद दी। उसी मुशायरे में फ़िल्म निर्देशक ए आर कारदार भी मौजूद थे जो उन दिनों "शाह जहां" नामक फ़िल्म पर काम कर रहे थे। वो मजरूह सुल्तानपुरी से इतने प्रभावित हुए कि उस फ़िल्म के गीत लिखने की फ़रमाइश कर दी, मजरूह ने हामी भर ली और नौशाद ने उस गीत की धुन बनाई। ख़ुमार बाराबंकवी ने भी उसी फ़िल्म से गीत लेखन आरंभ किया।

आज की प्रस्तुति

जिगर के समकालीन , मसनवी " प्याम-ए-सावित्री" के लिए मशहूर, हदीस-ए-ख़ुदी के शीर्षक से आत्मकथा प्रकाशित

अभी दीवानगी में कुछ कमी महसूस होती है

अभी शिद्दत-ए-ग़म ज़िंदगी महसूस होती है

पूर्ण ग़ज़ल देखें

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जगन्नाथ आज़ाद

A Conversation With Mukta Lal || Kuchh Yaadein Kuchh Batein || Rekhta

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