आज के चुनिन्दा 5 शेर

मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी

अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं

अज्ञात
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हवा तू ही उसे ईद-मुबारक कहियो

और कहियो कि कोई याद किया करता है

त्रिपुरारि
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कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती

हम को अगर मयस्सर जानाँ की दीद होती

ग़ुलाम भीक नैरंग

ईद आई तुम आए क्या मज़ा है ईद का

ईद ही तो नाम है इक दूसरे की दीद का

अज्ञात
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ईद का दिन है सो कमरे में पड़ा हूँ 'असलम'

अपने दरवाज़े को बाहर से मुक़फ़्फ़ल कर के

असलम कोलसरी
आज का शब्द

ज़ोहरा

  • zohra
  • زہرہ

शब्दार्थ

venus

पानी होवे आरसी उस मुख को देख

ज़ोहरा उसे क्या कि इक़ामत करे

शब्दकोश

Quiz A collection of interesting questions related to Urdu poetry, prose and literary history. Play Rekhta Quiz and check your knowledge about Urdu!

Among the following choose the singular of the word "Ahwal"
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क्या आप जानते हैं?

ईद के मा'नी हैं ख़ुशी का वो दिन जो बार-बार आए। ईद-उल-फ़ित्र इस्लामी तेहवार है जिसे हिन्दुस्तान में अक्सर “मीठी ईद” भी कहते हैं। रमज़ान के रोज़ों के बाद इस्लामी महीने "शव्वाल" की पहली तारीख़ को ये तेहवार दुनिया भर में मनाया जाता है इस दिन मुस्लमान फ़ित्रा या’नी ग़रीबों को सदक़ा या दान देते हैं इस लिए उसको ईद-उल-फ़ित्र कहते हैं।
उर्दू शायरी में ईद का चाँद देखने और ईद के दिन गले मिलने पर इतने अशआ’र हैं कि पूरी एक किताब बन सकती है।
ईद का चाँद तुम ने देख लिया
चाँद की ईद हो गई होगी
“ईद का चाँद हो जाना”, या’नी बहुत दिनों बाद मिलना बोल चाल का एक आ’म मुहावरा भी है।
क्या आप जानते हैं “ईदी” क्या होती है?  ईद के दिन बच्चों को घर के सारे बड़े लोग और रिश्तेदार जो पैसे या तोहफ़े देते हैं वो तो ‘ईदी’ होती ही है, इसके अलावा वो नज़्म या अशआ’र जो उस्ताद लोग बच्चों को ईद से एक रोज़ पहले, किसी ख़ुश-नुमा काग़ज़ पर लिख कर ईद की मुबारकबाद के तौर पर देते थे और उसके बदले हक़ उस्तादी वसूल करते थे वो भी ईदी कहलाती थी, वो ख़ुश-नुमा काग़ज़ जिस पर ईद के अशआ’र या क़ित'अ लिखते थे वो भी ईदी कहलाती थी । वो मेवा, मिठाई और नक़दी वग़ैरा जो ईद के दिन ससुराल से आए या ससुराल में भेजी जाये उसको भी ईदी कहते हैं।

क्या आप जानते हैं?

कैफ़ी

कैफ़ी आज़मी (1918-2002) ने अपनी सारी ज़िंदगी इंसान दोस्ती और ग़रीबों के हुक़ूक़ के लिए अमली۔तौर पर वक़्फ़ कर दी थी और उनकी सारी शायरी भी इसी की तर्जुमान है। ज़िंदगी के आख़िरी दौर में जब उन पर फ़ालिज का हमला हो चुका था तब भी उनका ये जज़्बा आज़मगढ़ में अपने आबाई गाँव मिजवाँ की तरक़्क़ी का बाइस बना। कुछ बरस वो अपनी थेटर और फ़िल्म अदाकारा बेगम शौकत कैफ़ी के साथ वहाँ जा कर रहे, हालाँकि ज़िंदगी के उस दौर में बम्बई में उनको हर तरह का आराम मयस्सर था। बहुत सी रुकावटों और मुख़ालिफ़तों से लड़ कर, सरकारी अफ़सरों से जूझ कर उन्होंने उस छोटे से पसमांदा गाँव का नक़्शा बदल ही दिया। कैफ़ी आज़मी की कोशिशों की वजह से उस गाँव में अब सड़क है, बिजली है, छोटा सा छः बिस्तरों वाला अस्पताल है, स्कूल और पोस्ट ऑफ़िस है। उनकी बेटी शबाना आज़मी ने जो उस ज़माने में मेम्बर ऑफ़ पार्लियामेंट थीं एक ट्रेन दिल्ली और आज़मगढ़ के बीच शुरू करवाई थी जिसका नाम कैफ़ी आज़मी की कुल्लियात के नाम पर ‘‘कैफ़ियात’’ रखा गया। शौकत कैफ़ी ने अपनी ख़ुद-नविश्त ‘‘याद की रह-गुज़र’’ में कैफ़ी के मिजवाँ में क़ियाम और गाँव की तरक़्क़ी के लिए कोशिशों की तफ़्सील बहुत दिलचस्प अंदाज़ में लिखी है।

क्या आप जानते हैं?

शमीम

प्रोफ़ेसर शमीम हनफ़ी (1939-2021) विश्व प्रसिद्ध बुद्धिजीवी, आलोचक, नाट्य लेखक, शाइर, कहानी लेखक और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रोफ़ेसर एमिरेट्स थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वह एक सफल कॉलम लेखक भी थे। उनके कॉलम देश के विभिन्न अख़बारों में छपते रहे। उनके कॉलमों की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि जिस अख़बार में उनका कॉलम जिस दिन छपता था उस अख़बार की एक भी प्रति उस दिन स्टॉक में नहीं बचती थी। यह क्रम 1963 से शुरू हुआ था और लगभग 50 सालों तक चला। शमीम साहब ने अपने कॉलम लेखन को कभी अपना पेशा नहीं बनाया। विषय के रूप में यह कॉलम राजनीतिक और साहित्यिक थे। उनका कहना था कि ये कॉलम उनके सामाजिक सरोकारों के दस्तावेज़ थे। लेकिन ये ऐसी साहित्यिक रचनाएँ थीं जो उनकी साहित्यिक आलोचना के बहुत निकट थीं। उनके 98 कॉलमों की एक किताब " ये किस का ख़्वाब तमाशा है " के नाम से छप चुकी है। शमीम साहब ने इन्दौर में 1965 में अपनी पहली लेक्चररशिप के समय हिन्दी में बच्चों का एक अख़बार भी अपने दोस्तों के साथ मिल कर निकाला था। ड्रामा लेखन के साथ साथ उन्होंने बच्चों के लिए भी कई दिलचस्प किताबें लिखी हैं।

क्या आप जानते हैं?

गुलज़ार

उर्दू के तरह-दार शायर, गंगा-जमनी तहज़ीब के अमीन और पास-दार जंग-ए-आज़ादी के मुजाहिद जनाब पंडित आनंद मोहन ज़ुत्शी गुलज़ार देहलवी (1926-2020) रमज़ान के महीने में हर साल एक रोज़ा रखते थे जिसे ख़ुद उन्हों ने ‘‘रोज़ा रवादारी’’ का नाम दिया था। आम-तौर पर ‘‘जुमअतुल-विदा’’ या'नी रमज़ान के महीने के आख़िरी जुम’ए को वो ये रोज़ा रखते थे। उनके अहबाब बा-क़ाएदा चंदा कर के बहुत शानदार इफ़्तार की दावत का एहतिमाम करते थे। दावत-नामे डाक से भेजे जाते थे। इस रोज़ा-इफ़्तार में बिला-तफ़रीक़ मज़हब-ओ-मिल्लत अहम शख़्सियात शरीक होती थीं।
वो कहते हैः-
दर्स-ए-उर्दू-ज़बान देता हूँ
अहल-ए-ईमाँ पे जान देता हूँ
मैं अजब हूँ इमाम उर्दू का
बुत-कदे में अज़ान देता हूँ
शायरी के साथ साथ वो उर्दू के पहले उर्दू साइंस मैगज़ीन ‘‘साइंस की दुनिया’’ के बरसों एडिटर भी रहे जिसे हुकूमत-ए-हिन्द ने 1975 में शुरूअ' किया था।

क्या आप जानते हैं?

अख़्तर

अख़्तर शीरानी जो रूमान के शायर कहलाते हैं, उन्होंने पहली बार उर्दू शायरी में महबूबा को कोई नाम दिया। सलमा, रेहाना और अज़रा उनकी नज़्मों में लताफ़त व मुहब्बत का जीता जागता पात्र हैं। उन्होंने ख़ुद अपने एक दोस्त से यह स्वीकार किया था कि सलमा उनकी महबूबा का असल नहीं फ़र्ज़ी नाम है और बाकी नारी नाम भी उसी का बिंब हैं:
यही वादी है वो हमदम जहां रेहाना रहती थी
वो इस वादी की शहज़ादी थी और शाहाना रहती थी
उर्दू में सानेट लिखने की शुरुआत भी उन्होंने ही की थी लेकिन रूमानी शायर के तौर पर उनकी शोहरत उनके कहानी लेखन और अनुवाद पर हावी हो गई। शराब नोशी की ज़्यादती की वजह से अख़्तर शीरानी (1905-1948) सिर्फ़ 43 वर्ष की उम्र में दुनिया से चले गए लेकिन इस छोटी सी अवस्था में उन्होंने नज़्म व नस्र (कविता और गद्य) में इतना कुछ लिखा कि बहुत कम लोग अपनी लम्बी उम्र में भी इतना लिख पाते हैं। उन्होंने मशहूर तुर्की नाटककार सामी बे के नाटक "कावे" को "ज़हाक" के नाम से उर्दू रूप दिया था। "आईना ख़ाने में" उनके पांच अफ़सानों का संग्रह है। कहा जाता है कि यह सब एक ही रात में लिखे गए थे। ये अफ़साने फ़िल्मी अदाकाराओं की आपबीती के रूप में हैं जिनमें औरतों के शोषण की कहानी है। वह बहुत से अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए लार्ड बायरन आफ़ राजस्थान, इब्ने बतूता, बालम, राज कुमारी, बकावली, अक्कास वग़ैरह के फ़र्ज़ी नामों से कालम लिखते थे।

जश्न

जन्मदिन

पाकिस्तान की अग्रणी शायरात में विख्यात।

छलक रही है मय-ए-नाब तिश्नगी के लिए

सँवर रही है तिरी बज़्म बरहमी के लिए

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