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क्या आप जानते हैं?

वो अल्फ़ाज़ जो गुफ़्तुगू में हज़ारों बार बोले जाते हैं, उन पर ग़ौर करें तो वो भी बहुत से रूप दिखाते हैं। ऐसा ही मुआ'मला ‘न’ और ‘ना’ का है।
गूँजती है तिरी हसीं आवाज़
जैसे नादीदा कोई बजता साज़
जाँ निसार अख़्तर 

नादीदा या'नी जो नज़र न आ रहा हो। और इसी से मिलता-जुलता लफ़्ज़ है ‘नदीदा’ या'नी लालची शख़्स। इसका लफ़्ज़ी मतलब है, जिस ने देखा न हो। लालची शख़्स किसी चीज़ को ऐसे ही देखता है जैसे इस से पहले कभी उस ने देखी ही न हो। ‘ना’ दूसरे लफ़्ज़ों के साथ जुड़ कर नफ़ी का काम करता है जैसे ‘नालायक़’ ‘ना-ख़ुश’ वग़ैरा।
‘न’ और ‘ना’ और ‘नहीं’ कहाँ इस्ति'माल होगा कहाँ नहीं इस बारे में अहल-ए-ज़बान ख़ूब जानते हैं।  ‘न’ कहाँ लिखा और बोला जाएगा ग़ालिब के इस शे'र से वाज़ेह है:
न सुनो गर बुरा कहे कोई 
न कहो गर बुरा करे कोई
लेकिन फ़िल्मी शाइरी में जावेद अख़्तर के लिखे मशहूर गाने में ‘‘कुछ ना कहो- कुछ भी ना कहो’’
मौसीक़ी की ज़रूरत के तहत लिखा गया है और कुछ ऐसा बुरा भी नहीं लगता अब अहल-ए-ज़बान चाहे जो भी कहें।
‘ना’ का इस्ति'माल उर्दू में ताकीद और ताईद के लिए भी होता है:
किसी बुज़ुर्ग के बोसे की इक निशानी है
हमारे माथे पे थोड़ी सी रौशनी है ना

क्या आप जानते हैं?

जोश

जोश मलीहाबादी ने कुछ वर्ष पूने में शालिमार स्टूडियो में गुज़ारे और वहां कुछ फिल्मों के गाने लिखे। 1944 में रीलिज हुई मशहूर फ़िल्म "मन की जीत" जो मशहूर अंग्रेज़ी लेखक थामस हार्डी के उपन्यास "Tess of the d'Urbervilles" से प्रेरित थी और डब्ल्यू ज़ेड अहमद के निर्देशन में बनी थी, उस फ़िल्म के सात में से छः गाने जोश मलीहाबादी ने लिखे थे।
उस फ़िल्म में उनका एक गीत ज़ोहरा बाई अंबालेवाली का गाया हुआ बहुत मशहूर हुआ था,"मोरे जोबना का देखो उभार", तत्कालीन सरकार को उसका मुखड़ा अश्लील लगा था और उस गीत को आल इंडिया रेडियो से प्रसारित करने पर पाबंदी लगा दी गई थी। हालांकि उस गीत में महबूबा के हुस्न की मिसालें बहुत अनोखी थीं:
जैसे भंवरों की झूम
जैसे सावन की धूम
जैसे सागर की भोर
जैसे उड़ता चकोर
जैसे नदी की मौज
जैसे तुर्कों की फ़ौज
बिल्कुल इसी अंदाज़ पर बरसों बाद जावेद अख़्तर ने फ़िल्म "1942 ए लव स्टोरी" के लिए गाना लिखा था," एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा"।
जोश मलीहाबादी ने जितनी भी फ़िल्मों के लिए गाने लिखे वह कभी पहले से तैयार किए गए संगीत के अनुसार नहीं लिखे बल्कि हमेशा फ़िल्म की सिचुएशन के के अनुसार लिखे।उन फ़िल्मों के निर्देशक और संगीतकार की ज़िम्मेदारी थी कि वे उन्हें संगीत में ढालें।

क्या आप जानते हैं?

बिना तरन्नुम के शायरी सुनाने को "तहत उल लफ़्ज़" कहा जाता है जिस को "तहत में पढ़ना" भी कहते हैं। शायरी को तरन्नुम से पेश किया जाए तो तर्ज़ और पढ़ने वाले की आवाज़ श्रोताओं को ज़्यादातर आकर्षित रखती है, जबकि तहत उल लफ़्ज़ में शब्दों की शान, आवाज़ के उतार चढ़ाव से शायरी का पूरा लुत्फ़ आता है। मुशायरों में ग़ज़लें और नज़्में तहत में बख़ूबी पढ़ी जाती हैं लेकिन शोक सभा में तहत उल लफ़्ज़ मर्सिया पढ़ने वालों ने तो उसे एक विशेष नाटकीय कला में रूपांतरित कर दिया है। मशहूर मर्सिया गो मीर अनीस के एक समकालिक मशहूर शायर मीर अनीस की मर्सिया गोई के क़ाइल न थे, उन्होंने लिखा है कि एक बार संयोग से अनीस की मजलिस में शिरकत हुई, मर्सिया के दूसरे ही बंद की बैत (छंद):
सातों जहन्नुम आतिश ए फ़ुरक़त में जलते हैं
शोले तिरी तलाश में बाहर निकलते हैं
"अनीस ने इस अंदाज़ से पढ़ी कि मुझे शोले भड़कते हुए दिखाई देने लगे और मैं उनका पढ़ना, सुनने में ऐसा लीन हुआ कि तन बदन का होश न रहा।"
जब नई शायरी आज़ाद नज़्म के रूप में प्रकट हुई तो मुशायरों में उसको सुनने के लिए कोई आमादा नज़र नहीं आता था। मशहूर एक्टर और ब्राडकास्टर ज़िया मुहीउद्दीन ने नून मीम राशिद की नज़्में विभिन्न आयोजनों में सुनाने का प्रयोग किया। उन्होंने कुछ इस तरह ये नज़्में सुनाईं कि जिन श्रोताओं के लिए ये नज़्में अस्पष्ट और व्यर्थ और काव्यात्मक अभिव्यक्ति से दूर थीं, वो भी इस पढ़त के जादू में आ गए और उन्हें उन नज़्मों में शायरी भी नज़र आ रही थी और मायने भी।

क्या आप जानते हैं?

इफ़्तिख़ार

"आज जाने की ज़िद न करो"एक बहुत ही मक़बूल व मशहूर ग़ज़ल है। फ़ैयाज़ हाशमी की लिखी इस ग़ज़ल को सब से पहले हबीब वली मोहम्मद ने पाकिस्तान की एक फ़िल्म "बादल और बिजली"(1979) के लिए गाया था मगर बाद में मलिका ए ग़ज़ल फ़रीदा ख़ानम ने इस ग़ज़ल को गा कर अमर कर दिया। फ़ैयाज़ हाशमी के एक दोस्त का कहना है कि इस ग़ज़ल के कुछ अश्आर उन्होंने कलकत्ते में छात्र जीवन में लिखे थे जो उनकी पहली लेकिन नाकाम इश्क़ की देन थी। वो शायरी के अलावा संगीत का भी ज्ञान रखते थे। उनकी इस विशेषता के आधार पर कम उम्री में ही कलकत्ता में H.M.V ग्रामोफोन कम्पनी के डायरेक्टर बना दिए गए और वहां अनगिनत गाने लिखे।
सन् 1935 में वह हिंदुस्तान में फ़िल्मी दुनिया से सम्बद्ध हो गए थे। भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए और वहां भी बहुत शोहरत पाई।
उन्होंने फ़िल्मी गीतों में उर्दू और हिंदी के मिश्रण से एक नया रंग भरा जिसकी वजह से गीतों को लाज़वाल शोहरत अता की। महात्मा गांधी ने फ़ैयाज़ हाशमी के नग़मे सुन कर कहा था,"अगर फ़ैयाज़ जैसे चंद शायर और पैदा हो जाएं तो उर्दू हिंदी का झगड़ा मिट जाए।" उस वक्त के समस्त प्रसिद्ध गायकों ने उनके लिखे सैकड़ों गाने गाए। पंकज मलिक का गाया हुआ मशहूर गाना:
"ये रातें ये मौसम ये हंसना हंसाना।" भी उनकी ही रचना है। गाने की धुन बनाते वक्त अगर कहीं कोई संगीत निर्देशक उनसे कहता कि फ़ैयाज़ साहब बोल सही नहीं बैठ रहे, आप मिसरे में तब्दीली कर दीजिए तो तुरंत वो मिसरा गा कर ख़ुद बताते कि धुन यूं बनेगी तो मिसरे फ़िट होंगे और सचमुच मिसरों की तब्दीली के बिना गाना रिकॉर्ड हो जाता।

क्या आप जानते हैं?

जिगर

जिगर मुरादाबादी के स्वभाव में विनम्रता थी। ज़िंदगी के अधिकतर दिन मुरादाबाद,आगरा और फिर गोंडा में गुज़ारे। मुशायरों के सिलसिले में पूरे हिन्दुस्तान का दौरा किया और अपने समय के अत्यंत लोकप्रिय शायर रहे। कहा जाता है कि उस वक्त मुशायरों में उनका मानदेय 500/- रुपए होता था। इन सब के बावजूद उनका दाम्पत्य जीवन बहुत बिखरा हुआ था। मदिरापान और आवारगी की अधिकता से उनकी पत्नी बहुत नाराज़ होती थीं। आख़िरकार असग़र गोंडवी के मशवरे पर अपनी बीवी नसीम को तलाक़ दे दी और फिर असग़र गोंडवी ने उनसे शादी कर ली।