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मंटो

MORE BYमोहम्मद हसन असकरी

    मंटो मर गया। वह मेरा दोस्त था, उसके मरने पर मैं रोऊँ या न रोऊँ, यह मेरा ज़ाती (निजी) मामला है। उसके बारे में मातमी मज़मून (लेख) लिखते हुए मैं पूरी संगदिली (कठोरता) से काम लूँगा। यानी मंटो ही की रिवायत (परंपरा) पर अमल करूँगा। गांधी जी, क़ायदे आज़म, अख़्तर शीरानी... तीन आदमियों की मौत पर मैंने मंटो का हाल देखा है। ऐसे मौक़ों पर वह रो भी लेता था। उस पर आध-आध घंटे के लिए सक्ता तारी होता था (वह सन्न रह जाता था), लेकिन फिर वह घर से निकल पड़ता। सारे शहर का चक्कर लगाता। एक-एक आदमी से पूछता कि तुम्हारा रद्दे-अमल (प्रतिक्रिया) क्या है। फिर घर आके मुख़्तलिफ़ (विभिन्न) पहलुओं से इस वाक़ये पर ग़ौर करता। उसे उलट-पलट के देखता। इसके कारणों और नतीजों का जायज़ा लेता और कई-कई दिन तक उसे यह फ़िक्र लगी रहती कि आख़िर इस बात के मायने क्या हैं।

     

    शायद मंटो दूसरी दुनिया में बैठा फ़रिश्तों को अपनी मौत का मतलब समझा रहा होगा। फिर मैं क्यों रोऊँ? मैं इस दुनिया में बैठ के उसका काम क्यों न करूँ? मंटो के दिल में एक आग सी जलती रहती थी... वह हर चीज़ का मतलब समझने को बेचैन रहता था। मैं आँसू बहा के यह आग बुझाऊँ? वह उन लोगों में से नहीं था जिनके मरने पर आँसू बहा के हम अपने फ़र्ज़ से सुबकदोश (मुक्त) हो जाएँ। मंटो ऐसा आदमी नहीं था कि हम ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थीं मरने वाले में कह के उसके सारे ऐब नज़रअंदाज़ कर दें। उसके अफ़सानों (कहानियों) के साथ, उसकी ख़ूबियों के साथ उसका एक-एक गुनाह भी ज़िंदा रहना चाहिए। मंटो माफ़ करने या माफ़ किए जाने के लिए पैदा नहीं हुआ था। मंटो कोई कुत्ता या बिल्ली नहीं था कि वह आपके बावर्चीख़ाने (रसोई) में से दूध पी जाए और आप उसे माफ़ कर दें।

     

    मंटो मर्द था। वह दुनिया में औरों की तरफ़ से या अपनी तरफ़ से उज़्रख़्वाहियाँ (सफ़ाइयाँ) पेश करने नहीं आया था, बल्कि औरों से उनके गुनाह क़ुबूलवाने और ख़ुद अपने गुनाह क़ुबूलवाने और अपने गुनाह, उसने तो हम सबके गुनाह भी अपने कंधों पर उठा रखे थे। वह बेचारा तो मरा ही इस बोझ के नीचे पिस के। मैं उसकी नेकियाँ याद दिला के उसे बुज़दिल साबित नहीं करूँगा। मंटो ज़िम्मेदार आदमी था, नई से नई ज़िम्मेदारियाँ अपने सर लेता था। सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी तो उसने समझने और समझाने की मोल ले रखी थी। यह हिम्मत आज उर्दू के किस अदीब (लेखक) में है? यह मंटो नहीं मरा, एक तर्ज़े-हयात (जीवन-शैली) मरा है।

     

    और वह आदमी कब था? मंटो तो एक उसलूब (शैली) था... लिखने का नहीं, जीने का... वाक़ई मंटो बड़ी ख़ौफ़नाक चीज़ था। वह एक बग़ैर जिस्म की रूह बन के रह गया था। जो घबराहट मुझे दोस्तोवस्की के नॉवेल पढ़ के होती है वही मंटो पढ़ के होती थी। अगर आप मुझसे पूछें कि तुमने कभी भूत देखा है तो मैं कहूँगा, हाँ... मंटो सोचता तो एहसासात (भावनाओं) और शारीरिक क्रियाओं के ज़रिए ही था। लेकिन यह वह चीज़ थी जिसके बारे में स्पेन के सूफ़ियों ने कहा है कि जिस्म की भी एक रूह होती है, यह रूह मंटो ने पाली थी। वह किसी अख़लाक़ी (नैतिक) या ज़ेहनी (मानसिक) ख़ोल के अंदर नहीं रहता था। आम तौर से लोग अपने ऊपर कोई ख़ोल इस बुरी तरह चढ़ाए रखते हैं कि चीज़ें उन तक नहीं पहुँच सकतीं, ख़ोल से टकरा के रह जाती हैं। वे बस टकराने की आवाज़ ही सुनते हैं।

     

    मंटो ने अपनी रूह को बिल्कुल ही बे-हिफ़ाज़त छोड़ दिया था। हर चीज़ मंटो तक पहुँचती थी और इतने ज़ोर का टकराव होता था कि कई बार वह चकरा के रह जाता था। बहरहाल चीज़ें उस तक पहुँची ज़रूर थीं, चाहे वह उसका मतलब समझने में कामयाब हो या न हो। मंटो में अगर कोई ख़ामी थी तो यह कि उसके पास एहसासात तो बहुत थे लेकिन उन्हें तरतीब (क्रम) देने और नियंत्रण में लाने की सलाहियत (क्षमता) मज़बूत न थी। लेकिन इतने मुख़्तलिफ़ और विविध एहसासात को सहारने की ऐसी ताक़त भी हमारे किस अदीब में है? उसे हर चीज़ महसूस करने का शौक़ था बल्कि यह तो उसकी मजबूरी थी। वह चीज़ों को इसलिए नहीं देखता था कि उन्हें काम में लाना है या इंसानों में इस्तेमाल करना है, वह तो एहसास की मशीन बन गया था जो ख़ुद-ब-ख़ुद काम करती रहती थी।

     

    एक दफ़ा मंटो ने अपने किसी अफ़साने के बारे में मेरी राय माँगी। मैंने कह दिया बहुत अच्छा है। मंटो ने कहा सच-सच बताओ। मैंने फिर वही बात दोहरा दी। मंटो की तसल्ली न हुई। कहा मेरे अफ़साने की तारीफ़ न करो। कोई ख़ामी बताओ। मैंने जवाब दिया, इसका ख़ात्मा (अंत) कुछ मुनासिब नहीं मालूम होता। हालाँकि मंटो मुझसे किसी मामले में बहस न करता था लेकिन उस वक़्त उसे मेरी बात पसंद न आई। कहने लगा यह अफ़साना मैंने नहीं लिखा मेरे किरदार (पात्र) ने लिखा है। जिस तरह उसने कहा वैसे ही मैंने ख़त्म कर दिया। असल क़िस्सा यही है। मंटो से चीज़ें ही अफ़साना लिखवाती थीं इसलिए तो उसका अफ़साना कभी अच्छा होता था, कभी ख़राब, यह तो मैं मानने को तैयार नहीं कि मंटो में अपने दिमाग़ के ज़रिए अपने एहसासात को क़ाबू में लाने की अहलियत (योग्यता) न थी, इसका हाल तो बाबू गोपीनाथ से मालूम हो सकता है। अलबत्ता कभी-कभी चीज़ें उसके दिमाग़ पर बुरी तरह हावी हो जाती थीं और उसे अपनी तरफ़ खींचने लगती थीं। इस खींचातानी में उसका अफ़साना बिगड़ जाता था। लेकिन वैसे हर चीज़ अपनी जगह निहायत ठोस होती थी। चीज़ों को इस तरह क़ुबूल करने के लिए भी जिगरा चाहिए।

     

    मंटो के बारे में मशहूर है कि वह बड़ा ख़ुदपसंद था और अपने ऊपर एतराज़ बर्दाश्त करने की ताब (सहनशक्ति) उसमें न थी, कुछ लोगों ने तो हमदर्दाना नुक़्तए-नज़र (दृष्टिकोण) से ही सही, मगर यहाँ तक कहा है कि उसकी अनानियत (अहंकार) ने ही उससे अफ़साने लिखवाए। मेरा ज़ाती ख़याल यह है कि अनानियत की मदद से आदमी तनक़ीद (आलोचना) या बुरी-भली नज़्में लिख ले तो लिख ले, अफ़साने नहीं लिख सकता। अफ़साना लिखने के लिए तो सड़क के रोड़ों तक को अपने ऊपर फ़ौक़ियत (प्राथमिकता) देनी पड़ती है। रहा मंटो तो उसके बारे में तो मैं वुसूक़ (यकीन) के साथ कह सकता हूँ कि उसकी अनानियत बस एक ढोंग था, जो उसने अपनी सच्चाई की हिफ़ाज़त के लिए रचाया था। अदीबों और अदबी (साहित्यिक) हल्क़ों के लिए उसने एक अलग चेहरा तैयार करके रखा था। जिसे वह ऐसे मौक़ों पर फ़ौरन ओढ़ लेता था। यह भी दरअसल मंटो का एक तजुर्बा था... दूसरों के साथ और ख़ुद अपनी शख़्सियत (व्यक्तित्व) के साथ उसकी ख़ुदसिताई (आत्म-प्रशंसा) भी एक ऐलाने-जंग था। बेहिसी (संवेदनहीनता) के ख़िलाफ़ यह भी एक दावत थी। जिन चीज़ों को उसने समझा था उन्हें समझने की वह तारीफ़ नहीं करता था बल्कि अपने अंदाज़े-नज़र (नज़रिए) की।

     

    रहा उसका इंकिसार (विनम्रता) तो उसे भी मंटो ने छुपा के नहीं रखा था कि उससे दोस्ती किए बग़ैर नज़र न ही आए। यह वह टाट नहीं था जिसे ख़ुदापरस्त बादशाह अपने सुनहरे लिबास के नीचे पहना करते थे। मंटो के इंकिसार के मुज़ाहरे (प्रदर्शन) चलते-फिरते भी देखे जा सकते थे। उसका ज़्यादा वक़्त ग़ैर-अदबी लोगों के साथ गुज़रता था और वह उनके साथ इस तरह शामिल रहता था जैसे बिल्कुल उन्हीं जैसा हो। वह लोगों से राब्ता (संपर्क) ज़ेहन के ज़रिए क़ायम नहीं करता था बल्कि एहसास के ज़रिए। जो लोग ज़ेहन के बग़ैर मंटो से तअल्लुक़ पैदा करना चाहते थे उन्हें कभी कामयाबी नहीं होती थी। फिर जिन लोगों ने सिर्फ़-ओ-महज़ अपने ज़ेहन की परवरिश की हो और अपनी शख़्सियत के ख़याली अनासिर (तत्वों) को दबाया हो, उनसे मिलकर मंटो को आसूदगी (संतुष्टि) नहीं होती थी। चुनाँचे ज़हानत (बुद्धिमत्ता) के अंदर महदूद (सीमित) रहने वालों के सिवा हर क़िस्म का आदमी मंटो का दोस्त नहीं बन सकता था, और बस यही दस-पंद्रह मिनट के अंदर।

     

    उसने कभी किसी को अपने से ज़ेहनी तौर पर कम नहीं समझा। हर आदमी का तजुर्बा उसके लिए उतना ही क़ाबिले-क़द्र (मूल्यवान) था जितना ख़ुद अपना। वह किसी को क़ुबूल करने से पहले शर्तें लागू नहीं करता था। मंटो की मुहब्बत भी शदीद (तीव्र) होती थी और नफ़रत भी। लेकिन हिक़ारत (तिरस्कार) का जज़्बा उसके अंदर नहीं था। अच्छा ही हुआ कि मंटो ने बाक़ायदा तौर पर ज़्यादा तालीम हासिल न की। इसीलिए तो आम आदमियों से उनकी सतह (स्तर) पर मिलने की सलाहियत महफ़ूज़ रही। उसकी नज़र में कोई इंसान बे-वक़अत (महत्वहीन) नहीं था। वह हर आदमी से इस तवक़्क़ो (उम्मीद) के साथ मिलता था कि उसकी हस्ती में भी ज़रूर कोई न कोई मान्वियत (सार्थकता) पोशीदा (छिपी) होगी जो एक न एक दिन ज़ाहिर हो जाएगी। मैंने उसे ऐसे-ऐसे अजीब आदमियों के साथ हफ़्तों घूमते देखा है कि हैरत होती थी। मंटो उन्हें बर्दाश्त कैसे करता है। लेकिन मंटो बोर होना जानता ही न था। उसके लिए तो हर आदमी ज़िंदगी और इंसानी फ़ितरत का एक मज़हर (प्रतीक) था, लिहाज़ा हर शख़्स दिलचस्प था। अच्छे और बुरे, ज़हीन (बुद्धिमान) और अहमक़ (मूर्ख), मुहज़्ज़ब (सभ्य) और ग़ैर-मुहज़्ज़ब का सवाल मंटो के यहाँ ज़रा न था। सिर्फ़ इतना ही नहीं कि वह हर क़िस्म के आदमी से रब्त-ओ-ज़ब्त (मेल-जोल) रख सकता हो, उसमें तो कमाल यह था कि वह समझता था कि हर शख़्स में मेरी ही जैसी ज़ेहनी सलाहियतें हैं।

     

    जिन दिनों मंटो और मैं उर्दू अदब मुरत्तब (संपादित) कर रहे थे, मंटो की यह आदत रोज़ नई उलझनें पैदा करती थी। जो भी चलता-फिरता मंटो के यहाँ आ निकला, मंटो ने फ़ौरन नसीहत की कि लिखना सीखो। उसे दो-चार मौज़ू (विषय) बताए, लिखने का तरीक़ा समझाया और मज़मून की फ़रमाइश कर दी। दो-तीन दिन बाद वे साहब अफ़साना या मज़मून लिए चले आ रहे थे। ज़ाहिर है ये चीज़ें किस क़िस्म की होती थीं। लेकिन रोज़ तजुर्बों के बाद भी मंटो की यह आदत न छूटी। वह समझता था कि अगर मैं लिख सकता हूँ तो सब ही लिख सकते हैं, आख़िर इस बात में ऐसी बात ही कौन सी है। ग़रज़ (निष्कर्ष) यह कि बस अदीबों के सामने ही अदीब बनता था। वरना उसमें तो इंसानों को क़ुबूल करने की सलाहियत इतनी ज़बरदस्त थी कि जैसा आदमी साथ हो मंटो वैसा ही बन जाता था।

     

    मैंने इस ख़ूबी को इंकिसार (विनम्रता) कहा है मगर इस लफ़्ज़ में एक तकल्लुफ़ (औपचारिकता) है, तसन्नो (बनावट) झलकता है, इसमें भी दूसरों पर अपनी फ़ौक़ियत (श्रेष्ठता) का एहसास पिन्हां (छिपा) है। मंटो में तो सच्चे फ़नकारों की नफ़ी-ए-ख़ुद (अहंकार-शून्यता) ही आ गई थी। वह हर वक़्त कुछ और बनता रहता था। वह जिन लोगों या जिन चीज़ों के मुताल्लिक़ (बारे में) लिखता था पहले ख़ुद भी वही बन जाता। मंटो जैसे फ़नकार को ख़ुद-परस्त (आत्ममुग्ध) कहने से पहले आदमी को अपना जायज़ा लेना चाहिए। अलबत्ता मुझे उससे शिकायत है कि मेरे साथ उसने ख़ुद-परस्ती से काम लिया। यानी मेरी इस तरह इज़्ज़त करता रहा जैसे मैं और वह दो बिल्कुल मुख़्तलिफ़ (अलग) क़िस्म की मख़्लूक़ (प्राणी) हैं। मुमकिन है मैंने उसकी बनिस्बत (तुलना में) दस-पांच किताबें ज़्यादा पढ़ ली होंगी मगर दस हज़ार किताबों से ज़्यादा पढ़ के भी आदमी मंटो नहीं बनता। दरअसल मेरी इज़्ज़त कर के मंटो मुझ पर तन्क़ीद (आलोचना) करता था। मंटो सर-ता-पा (सिर से पैर तक) फ़नकार था। उसकी सारी ज़िंदगी उसके एहसासात (भावनाओं) में थी। मैं यह दर्जा कभी हासिल नहीं कर सका। मंटो की मुझसे बेगानगी (दूरी) बिल्कुल बजा (उचित) थी। चाहे उसके इज़हार (प्रकट करने) का ज़रिया इज़्ज़त ही क्यों न हो।

     

    दरअसल उसके साथी बस उसके एहसासात (भावनाएं) ही थे। वह उन्हीं की सोहबत (संगत) में रहता था, चाहे अपने गिर्द (आसपास) एक मजमा जमाए रखे। लोग कहते हैं मंटो का मुशाहिदा (अवलोकन) बड़ा ज़बरदस्त था। ख़ारिजी (बाहरी) दुनिया को तो वह देखता ही था मगर उससे ज़्यादा वह अपने अंदर देखता रहता था। उस पर तक़रीबन हर वक़्त ही एक मुराक़बे (ध्यान) की सी कैफ़ियत (स्थिति) तारी रहती थी। ख़ुसूसन (विशेषकर) रात के वक़्त जब वह गिर्द-ओ-पेश (आसपास के माहौल) से ग़ाफ़िल (बेख़बर) होने लगता था। ऐसी हालत में बिल्कुल यूं मालूम होता जैसे मंटो अपने हवास-ए-ख़मसा (पांचों इंद्रियों) और अपने एहसासात से गुफ़्तगू (बातचीत) में मसरूफ़ (व्यस्त) हो। सूफ़ी लोग तो अपने ज्ञान-ध्यान के ज़रिए बा-हमा ओ बे-हमा (सबके साथ होकर भी सबसे अलग) का दर्जा हासिल करते थे। मंटो ने यह कैफ़ियत अपने एहसासात के ज़रिए हासिल की थी। मैं तो उसे बादा-ख़्वार (शराबी) होने के बावजूद वली (संत) समझता था। मंटो आरिफ़ (ज्ञानी) की बाज़ (कुछ) अहम ख़ुसूसियात (विशेषताओं) से ख़ाली न था।

     

    मंटो की आंखें थीं तो बड़ी-बड़ी, और वह गिर्द-ओ-पेश की हर चीज़ को निहायत ग़ौर से देखती नज़र आती थीं। लेकिन मुझे तो हमेशा ऐसा लगा है कि मंटो की आंखें अपने अंदर की कोई चीज़ ढूंढ रही हैं और उसके कान उस शोर-ओ-तूफ़ान को सुन रहे हैं जो ख़ुद उसके अंदर बपा (मचा हुआ) है। यूं तो जो हर चीज़ भी सामने आए मंटो उससे फ़ौरन तअल्लुक़ (संबंध) पैदा कर लेता था लेकिन उसकी बे-तअल्लुक़ी (निर्लिप्तता) एक हैबतनाक (भयानक) चीज़ थी। बुनियादी तौर से मंटो तन्हा आदमी था... यानी अपने सारे हंगामों के बावजूद... उसके अंदर एक ऐसा मरकज़ (केंद्र) था जहां तक कोई नहीं पहुंच सकता था और मंटो की जान यही मरकज़ था।

     

    यूं मंटो के पास दिमाग़ भी था, लेकिन उसने अपने सोचने का ज़रिया एहसासात (भावनाओं) को बना लिया था। दूसरा ज़रिया था अफ़आल (कर्म)। जब वह किसी चीज़ को समझना चाहता था तो कुछ न कुछ करता था। चाहे शराब पिए, चाहे सड़कों पर घूमता फिरे, चाहे किसी से लड़ पड़े, चाहे कोई अलम-ग़लम (ऊट-पटांग) मज़मून (लेख) लिख डाले। वह हर वक़्त कुछ न कुछ करता रहता था। क्योंकि हर वक़्त वह कुछ न कुछ समझना चाहता था। पहले से तय कर के नहीं कि मुझे फ़लां बात समझनी है, उसका काम तो समझना था। चाहे कोई बात भी समझ में आ जाए। अफ़साना-निगारी (कहानी लेखन) का कोई नुक्ता (पहलू) हो या इंसानी फ़ितरत (स्वभाव) का कोई राज़, या लज़्ज़त-अंदोज़ी (आनंद प्राप्ति) का कोई तरीक़ा, बे-मक़्सद कुछ न कुछ करने का जो फ़लसफ़ा (दर्शन) ज़ीद ने निकाला है, मंटो उसकी ज़िंदा मिसाल था। उसका हर लम्हा एक तजुर्बा था। उसका हर फ़ेल (कार्य) एक लेबोरेटरी। वह अपने तजुर्बात से पूरा-पूरा फ़ायदा नहीं उठा सका। अगर वह ज़ेहन की तरबियत (प्रशिक्षण) भी इसी इन्हिमाक (लगन) से करता तो मंटो और भी बड़ा अदीब (साहित्यकार) होता। ये बातें मुझे तस्लीम (स्वीकार) हैं मगर इस तरह ज़िंदगी बसर करने का इतना सलीक़ा भी आज किसमें है? किसी ने कहा है कि असली शायर वह है जो अपनी नज़्म की सारी तफ़्सीलात (विवरण) भी नज़र में रखे और उसे एक नुक़्ते (बिंदु) की तरह भी देख सके। इसी तरह असली शख़्सियत वह है जो अपनी तमाम रंगा-रंगी (विविधता) के बावजूद शोले की लौ की तरह नज़र आए। हमारे नए अदीबों में यह बात मंटो के सिवा और किसे हासिल हुई।

     

    मंटो शराबी था। जो कुछ भी था वह सबको मालूम है, यह कोई ढकी-छुपी बात नहीं। लेकिन अख़लाक़ी तहारत (नैतिक पवित्रता) की जैसी धुन मंटो को थी वैसी मैंने किसी और में नहीं देखी, वह बाहर से रिंद (शराबी) था अंदर से ज़ाहिद (तपस्वी)... गो (हालांकि) नासेह (उपदेशक) कभी नहीं बना। यह अख़लाक़ी तहारत वह अपने अंदर भी ढूंढता था और दूसरों में भी। बहुत से अफ़साने जो बाज़ (कुछ) लोगों को बहुत फ़ोहश (अश्लील) मालूम हुए, दरअसल उसकी इसी तहारत-पसंदी (पवित्रता-प्रेम) के नमूने हैं।

     

    इसी तरह बाज़ अफ़सानों में चंद हज़रात (सज्जनों) को पाकिस्तान की मुख़ालिफ़त (विरोध) नज़र आई, हालांकि इसमें मंटो ने ठेठ इस्लामी दयानतदारी (ईमानदारी) और उस अख़लाक़ी एहतिसाब (नैतिक आत्म-निरीक्षण) का मुज़ाहिरा (प्रदर्शन) किया था जिसका इस्तेमाल वह औरों पर ही नहीं, अपने आप पर भी करता था। फिर आज़ादी-ए-फ़िक्र-ओ-एहसास (विचार और भावना की स्वतंत्रता) कुछ ऐसी उसकी घुट्टी में पड़ी थी कि यह मयस्सर (उपलब्ध) न हो तो वह सांस नहीं ले सकता था। हज़ारों रुपये की आमदनी पर लात मार कर हिंदुस्तान से चला आया इसलिए कि वहां डॉन उसे पढ़ने को नहीं मिल पाता था। यह वह अख़बार है जिसने मंटो की ज़िंदगी में उसे दो-दो कॉलम लंबी गालियां दीं। उसकी किताबों की ज़ब्ती का मुतालबा (मांग) किया और उसके मरने के बाद अफ़सोस का एक लफ़्ज़ न लिखा। मुल्क में मंटो की जिस तरह क़द्रदानी हुई वह हमारी तहज़ीबी (सांस्कृतिक) ज़िंदगी का एक ख़ूनी वरक़ (पन्ना) है। फिर आज जिस तरह मंटो की मुजावरी (मज़ार की सेवा/अंधभक्ति) हो रही है वह भी हम देख रहे हैं। अगर मुझमें मंटो जैसी जुर्रत (हिम्मत) होती तो मैं सियाह हाशिए का दूसरा हिस्सा लिखता।

     

    मैं न मालूम कहां बहक गया। बात हो रही है मंटो की हुर्रियत-पसंदी (स्वतंत्रता-प्रेम) की, लोगों को दूसरों के ग़लबे (प्रभुत्व) से आज़ाद रहना सिखाने वाले तो बहुत हैं, लेकिन मंटो एक ऐसा आदमी था जो कहता था दूसरा मुझसे भी आज़ाद हो।

     

    मंटो ने जो ख़्वाब देखा था, वह छोटा हो या बड़ा, ज़िंदगी के मुताल्लिक़ उसने जो रवैया इख़्तियार (अपनाया) किया था उसमें ख़ामियां (कमियां) चाहे कितनी ही क्यों न हों, लेकिन असल बात यह है कि उसने मरते दम तक अपने ख़्वाब से ग़द्दारी नहीं की। वह शराब तो हमेशा से ही पीता चला आया था मगर अब लोगों से पैसे मांग-मांग के पीने लगा था। बहुत से लोग जो कल तक उसकी ख़ुशामद किया करते थे, अब उसे ज़लील समझने लगे थे... महज़ इतनी बात पर कि उसने सड़क चलते पकड़ के उनसे दो-चार रुपये मांग लिए। ये सब बड़ी बातें हैं। लेकिन क्या यह उसकी सबसे बड़ी ज़लालत (अपमान) न होती कि वह अपने ख़्वाब से बेवफ़ाई करता? कुछ दिनों से शहीद का लफ़्ज़ बड़ी फ़य्याज़ी (उदारता) से इस्तेमाल हो रहा है। मंटो अक्सर सोचा करता था कि शहीद किसे कहते हैं। ख़ैर किसी मक़्सद के लिए जान दे देना बड़ी मुश्किल है। लेकिन रोज़ की बेइज़्ज़ती बर्दाश्त करना और शर्म से घुल-घुल के मरना... सिर्फ़ इस बात के लिए कि मेरे ख़्वाब की इज़्ज़त महफ़ूज़ (सुरक्षित) रहे... यह कैसा काम है?

     

    मंटो के मरने पर लोगों को जो सदमा हुआ है वह भी इसी तरह समझने की चीज़ है जिस तरह मंटो की ज़िंदगी और मौत। उसके पढ़ने वालों ने कुछ ऐसा महसूस किया है जैसे अपना कोई सरपरस्त (अभिभावक) उठ गया हो। इसमें एक चीज़ तो यह भी ہے कि जो बातें और अदीब कहने की हिम्मत न कर सकते थे वह मंटो बेधड़क कह डालता था लेकिन इससे भी बड़ी चीज़ यह है कि मंटो की क़िस्म का फ़नकार हम जैसे आम लोगों के लिए एक ढाल का काम देता है। ज़िंदगी की जिन ज़हरा-गुदाज़ (दिल दहला देने वाली) हक़ीक़तों का शऊर (चेतना) हासिल किए बग़ैर हम ठीक तरह ज़िंदा नहीं रह सकते, उन्हें हमारे बजाय इस क़िस्म का फ़नकार महसूस कर के हमें बताता है। यानी वह हमारी तरफ़ से एहसास की अज़ीयत (पीड़ा) उठाता है। अगर ऐसा फ़नकार हमारे दरमियान न रहे तो फिर यह ज़िम्मेदारी अपनी-अपनी बिसात (क्षमता) भर हम सबको क़ुबूल करनी पड़ती है। मंटो के बाद यह बोझ हमारे कांधों पर आ पड़ा है। जब तक अनवरी ज़िंदा रहा, आसमान से जो बला भी आई अनवरी के घर का पता पूछती हुई आई। अब मेरे और आपके घर का पता पूछेगी। मंटो की मौत ने हमें इस कर्ब (कष्ट) में मुब्तला कर दिया है। हमें शऊर की बलाओं से महफ़ूज़ रखने वाली दीवार हमारे सामने से हट गई।

     

    बहरहाल उर्दू पढ़ने वाले इस बात में क़ाबिल-ए-दाद (प्रशंसा के योग्य) हैं कि उन्होंने यह तो समझ लिया कि मंटो हमारी सिपर (ढाल) था। हर क़ौम की तरह मुसलमान क़ौम से भी अपनी तारीख़ (इतिहास) में बीसियों क़िस्म की हिमाक़तें (मूर्खताएं) सरज़द हुई होंगी लेकिन यह क़ौम मुस्तक़िल (स्थायी) तौर से फ़क़ीहों (धर्मशास्त्रियों) के चक्कर में कभी नहीं आई। अब तक सैकड़ों शराबियों को रहमतुल्लाह अलैह (जिन पर अल्लाह की रहमत हो) बना चुकी है। पाकिस्तान के सिक़ा (विश्वसनीय) लोगों ने फ़तवा दिया कि मंटो नापाक है। उर्दू अदब के शैदाइयों (दीवानों) ने मग़रिबी (पश्चिमी) पाकिस्तान के क़स्बा-क़स्बा में मंटो की मग़फ़िरत (क्षमा) के लिए दुआएं मांगीं। जब तक फ़क़ीहों के फ़तवे पर ख़त-ए-तंसीख़ (रद्द करने की लकीर) खींचने वाले आम लोग ज़िंदा हैं मंटो कैसे मरेगा? यह रूह तो कभी हाफ़िज़ के रूप में आती है कभी मंटो के रूप में। हमारी तारीख़ आइंदा जिस रूप में चाहेगी उसे ज़िंदा कर लेगी। बहरहाल यह मंटो वाला रूप भी कुछ ऐसा नहीं था कि उस पर शरमाएं। हम बुज़दिल सही, मगर ख़ैर मंटो ने हमारी लाज रख ली और उसके मरने के बाद ही सही हमने भी उसकी लाज रख ली। आख़िर हमने पहचान लिया कि मंटो क्या था। अब तो वाक़ई मेरे दिल से पाकिस्तान ज़िंदाबाद का नारा निकलता है... वह नारा जो मरते दम तक मंटो के एक-एक फ़ेल और एक-एक लफ़्ज़ से बुलंद होता रहा... हालांकि हुकूमत तक ने उसे रोकने की कोशिश कर ली।

     

    (2)

    जिस दिन मंटो मरा था उस दिन भी मैंने यही कहा था कि मंटो जैसे आदमी की ज़िंदगी या मौत के बारे में जज़्बाती (भावुक) होने की ज़रूरत नहीं। हमें तो उसकी ज़िंदगी और मौत दोनों के मानी (अर्थ) मुतअय्यन (निर्धारित) करने चाहिए। मंटो तो उन लोगों में से था जो सिर्फ़ एक फ़र्द (व्यक्ति) या एक अदीब (साहित्यकार) से कुछ ज़्यादा होते हैं। फिर अब तो जज़्बात-परस्ती (भावुकता) की गुंजाइश यूं भी नहीं रही कि मंटो को मरे दो महीने से ज़्यादा हो गए और हमारे लिए यह सवाल ज़्यादा अहम हो गया है कि उर्दू अदब में या कम-अज़-कम (कम से कम) बीस साल के उर्दू अदब में मंटो की जगह क्या है।

     

    कुछ लोगों के ख़याल में मंटो उर्दू का सबसे बड़ा अफ़साना-निगार (कहानीकार) है। कुछ लोग कहते हैं कि मंटो चाहे मोपासां वग़ैरह की सफ़ (पंक्ति) में न आ सके लेकिन यूरोप के अच्छे-ख़ासे अफ़साना-निगारों से उसका मुक़ाबला किया जा सकता है। मैं इन दोनों बातों से मुत्तफ़िक़ (सहमत) हूँ बल्कि मैं तो यह भी कहता हूँ कि अगर मंटो मोपासां के बराबर नहीं पहुँच सका तो इसमें इतना क़ुसूर ख़ुद मंटो का न था जितना उस अदबी रिवायत (साहित्यिक परंपरा) का जिसमें वह पैदा हुआ। जिस बात में मंटो मोपासां से पीछे रह जाता है वह मोपासां की नस्र (गद्य) है और मोपासां को जिस क़िस्म की नस्र दरकार (ज़रूरत) थी वह फ्रांस में और कुछ नहीं तो कोई दो सौ साल से नशो-ओ-नुमा पा रही थी (विकसित हो रही थी)। मोपासां के पीछे रोशफ़ूको था, वाल्तेयर था, स्तांधाल था, फ़्लोबेयर था। मंटो के पीछे कौन था?

     

    मेरी बात का वह मतलब न समझिए जो उर्दू के एम.ए. समझेंगे। मैं यह नहीं कहता कि उर्दू की नस्र बिल्कुल फ़ुज़ूल है। इसमें बहुत सी ख़ूबियाँ हैं। लेकिन मंटो को जिन चीज़ों की ज़रूरत थी वह उर्दू नस्र की रिवायत में मौजूद न थीं। मंटो को पानी पीने के लिए अपने आप कुआँ खोदना पड़ा। मौज़ू (विषय) और हैयत (शिल्प/रूप) दोनों में मंटो की हैसियत एक पेश-रौ (अग्रदूत) की है। इसलिए मंटो के मुताल्लिक़ (बारे में) कोई आख़िरी फ़ैसला करने से पहले हमें यह देखना पड़ेगा कि उससे पहले उर्दू में क्या था, उसके हम-अस्र (समकालीन) क्या कर रहे थे, मंटो क्या कर सका और क्या न कर सका। ये बातें देखे बग़ैर हम मंटो को अच्छा या बुरा कह लेंगे। मगर उर्दू अदब (साहित्य) में मंटो की हैसियत हमारी समझ में न आएगी।

     

    मंटो ने जो कुआँ खोदा था वह टेढ़ा-भेंगा सही, और उसमें से जो पानी निकला वह गदला या खारी सही। मगर दो बातें ऐसी हैं जिनसे इंकार नहीं किया जा सकता। एक तो यह कि मंटो ने कुआँ खोदा ज़रूर, दूसरे यह कि उसमें से पानी निकाला। अब ज़रा गिनिए तो सही कि उर्दू के कितने अदीबों (साहित्यकारों) के मुताल्लिक़ ये दोनों बातें कही जा सकती हैं।

     

    मैं इस बात से बेख़बर नहीं हूँ कि आज से नहीं बल्कि शुरू ही से बहुत से ख़ुश-मज़ाक़ (अच्छी रुचि वाले) हज़रात को मंटो की इन दोनों ख़ूबियों से इंकार रहा है। इसके बरख़िलाफ़ (विपरीत) हमने यह भी देखा कि इक़बाल की वफ़ात (मृत्यु) से लेकर आज तक किसी उर्दू अदीब का मातम इस तरह नहीं हुआ जिस तरह मंटो का। आख़िर कोई चीज़ तो थी जिसने लोगों को इतना सोग (शोक) मनाने पर मजबूर किया। ख़ैर कुछ लोग इतनी मक़बूलियत (लोकप्रियता) को भी मंटो की पस्ती (गिरावट) का आख़िरी और क़तई (अंतिम) सुबूत समझेंगे क्योंकि उनका अक़ीदा (मान्यता) यह है कि अदीब को हर आदमी के लिए नहीं लिखना चाहिए। ऐसे लोगों को बीस साल से मंटो पर यही एतराज़ रहा है कि मंटो तो बस ऐसी बातें करता है जिससे लोग चौंक पड़ें। शायद यह कोई ग़ैर-शरीफ़ाना या ग़ैर-अदीबाना बात हो। लेकिन मैंने जो थोड़ा-बहुत अदब पढ़ा है उससे तो यही पता चलता है कि लोगों को चौंकाना अदीब का एक मुक़द्दस फ़रीज़ा (पवित्र कर्तव्य) रहा है। बल्कि मेलविल ने तो ऐसे लोगों पर लानत भेजी है जो चौंकाने से डरते हैं। मंटो को छोड़िए। बोदेलेयर जैसे शायर को क्या कहिएगा जिसका अदबी उसूल (साहित्यिक सिद्धांत) ही यह था कि मुतवस्सित तबक़े (मध्यम वर्ग) को चौंकाया जाए?

     

    अगर चौंकाना कोई बहुत बड़ा अदबी नुक़्स (साहित्यिक दोष) है तो चौंकने से डरना एक ज़हनी (मानसिक) बीमारी है, कमज़ोर शख़्सियत (व्यक्तित्व) की निशानी है। जो आदमी दूसरों को चौंकाना चाहे उसमें पहले ख़ुद चौंकने की सलाहियत (क्षमता) होनी चाहिए। जिस शख़्स के जिस्मानी, ज़हनी और अख़लाक़ी आसाब (नैतिक स्नायु/नसें) ज़िंदा न हों वह किसी को क्या चौंकाएगा। नंगी क्या नहाएगी क्या निचोड़ेगी। अगर कोई अदीब अपने पढ़ने वालों को चौंकाता है तो यह कोई शिकायत की बात नहीं। वरना तो फिर बढ़ई की शिकायत कीजिए कि उसने कुर्सी क्यों बनाई। ऐसा अदीब तो महज़ अपना फ़रीज़ा अदा करता है, हाँ अदीब से आप यह ज़रूर पूछ सकते हैं कि तुमने हमें चौंकाने के बाद दिखाया क्या। अगर हमें झिंझोड़ कर जगाने के बाद मंटो ने हमें इंसानी फ़ितरत (मानव स्वभाव) और इंसानी मुआशरे (मानव समाज) का कोई तमाशा नहीं दिखाया, अगर उसने हमारे अंदर ज़िंदगी का कोई नया शऊर (चेतना) पैदा नहीं किया तो फिर हम उसे गालियाँ देने में हक़-ब-जानिब (सही/न्यायसंगत) होंगे कि उसने हमें चैन से सोने भी नहीं दिया। जो लोग किसी क़ीमत पर जागना ही नहीं चाहते, उन्हें तो उनके हाल पर छोड़िए। लेकिन क्या आप नया क़ानून, हतक, बाबू गोपीनाथ जैसे अफ़साने पढ़ कर दयानतदारी (ईमानदारी) के साथ कह सकते हैं कि मंटो ने हमें चौंका कर मुफ़्त में हमारी नींद ख़राब कराई?

     

    अच्छा, मंटो ने चौंकाया भी है दो तरीक़े से। एक तो उसके अच्छे अफ़साने हैं जिन्हें पढ़ने के बाद महसूस होता है कि इंसानी हक़ीक़त हमारे लिए कुछ बदल सी गई है। दूसरी तरफ़ उसके बुरे अफ़साने हैं। मंटो का ढिंढोरची होने के बावजूद मुझे तस्लीम (स्वीकार) है कि उसने कुछ बहुत से ख़राब अफ़साने लिखे हैं। लेकिन उसके बुरे से बुरे अफ़साने में भी आपको दो-एक फ़िक़रे (वाक्य) ऐसे ज़रूर मिलेंगे जो किसी न किसी आदमी या चीज़ या ख़याल या एहसास को मुनव्वर (प्रकाशित) करके रख देंगे... चाहे यह रोशनी ऐसी हो जो आपको पसंद न आए। कुछ लोगों का ख़याल है कि इसमें भी आवुर्द (प्रयासपूर्ण रचना) ज़्यादा है, यह मंटो का मदारीपन था।

     

    मगर पहली बात तो यह है कि आमद (स्वतः स्फूर्ति) और आवुर्द का फ़र्क़ अदब में कोई मानी नहीं रखता। कोई चीज़ आमद हो या आवुर्द। फ़ैसलाकुन (निर्णायक) बात तो यह है कि उससे नतीजा क्या बरामद (प्राप्त) हुआ। अगर आवुर्द के ज़रिए किसी तजरबे (अनुभव) को इज़हार (अभिव्यक्ति) मिल गया तो वह आमद से बेहतर है। दूसरी बात यह है कि नवा-ए-सरोश (ईश्वरीय वाणी/प्रेरणा) भी दो तरह सुनी जाती है। कभी तो सरोश (देवदूत) अपने आप बोल पड़ता है। कभी उसके कान मरोड़ने पड़ते हैं। सरोश की फ़य्याज़ी (उदारता) से तो हर आदमी ही अदीब बन सकता है, लेकिन सरोश को ज़बरदस्ती बुलवाने के लिए हिम्मत दरकार है। क्योंकि सरोश के कान मरोड़ने का मतलब है अपने कान मरोड़ना। आप यह तो ज़रूर कह सकते हैं कि बाज़ दफ़ा (कई बार) मंटो ने सरोश के कान इस तरह मरोड़े कि वह बोलने के बजाय चीख़ पड़ा या ऊल-जलूल बकने लगा। लेकिन मंटो ने हौसला तो दिखाया। यह कह देना तो आसान है कि मंटो करता ही क्या था। वह बेजोड़ बातों को जोड़ देता था मगर यह समझना मुश्किल है कि अनमेल बेजोड़ में आदमी का हुलिया बिगड़ जाता है।

     

     

     

    जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार

     

     

     

    क़ैस (मजनूँ) के सिवा और कोई काम न आ सका, यानी सिर्फ़ उसी ने हिम्मत दिखाई।

     

     

    मंटो के अंदर इस शोबदेबाज़ी (जादूगरी/बाजीगरी) की तह में जो चीज़ काम कर रही थी कि मंटो अपने किसी छोटे से छोटे एहसास या जज़्बे को दबाने या रद्द करने का क़ायल न था। हर चीज़ उसके अंदर कोई न कोई रद्दे-अमल (प्रतिक्रिया) पैदा करती थी और वह उस रद्दे-अमल को क़ुबूल कर लेता था। इन छोटे-छोटे और वक़्ती तजरबात (तात्कालिक अनुभवों) को एक-दूसरे से मुताल्लिक़ (संबंधित) और मुनज़ब्त (व्यवस्थित) करते रहने की आदत उसमें न थी। वक़्ती रद्दे-अमल को वह इतना दिलचस्प या वक़ीअ (महत्वपूर्ण) समझता था कि उस पर इंज़िबात (व्यवस्था) और इर्तिबात (संबंध) को क़ुर्बान कर देता था। इसीलिए उसके अफ़साने कभी तो बहुत अच्छे होते थे, कभी बुरे और कभी अफ़साने में एक-आध फ़िक़रा ही काम का निकलता था। मंटो में यह बहुत बड़ा नुक़्स (दोष) था लेकिन उर्दू के दूसरे अफ़साना-निगारों का हाल यह रहा है कि वे या तो अपने एहसास को ढर्रे पर लगा देते हैं। उस डगर से हट कर किसी और क़िस्म के तजरबे की सलाहियत उनमें बाक़ी ही नहीं रहती या फिर वे छोटे-छोटे और हंगामी (अस्थायी) तजरबात को हक़ीर (तुच्छ) समझ कर रद्द करते चलते हैं। यही वजह है कि हमारे अदीब दो-चार अच्छे अफ़साने लिखकर ठप हो जाते हैं।

     

    उर्दू अफ़साने में बस मंटो एक ऐसा आदमी है जो किसी जज़्बे या एहसास से न डरता था और जिसके लिए कोई एहसास हक़ीर या ग़ैर-दिलचस्प न था। कुछ हज़रात ने मंटो के कारनामे को यह कहकर उड़ाने की कोशिश की है कि मंटो के यहाँ अफ़साने का ख़ाम मवाद (कच्ची सामग्री) तो है, अफ़साने नहीं हैं। इसका मंतक़ी (तार्किक) नतीजा यह निकलता है कि उर्दू के दूसरे अफ़साना-निगारों के पास ख़ाम मवाद तक नहीं। क्योंकि ख़ाम मवाद तो एहसासात और जज़्बात ही फ़राहम (प्रदान) करते हैं। जब आदमी अपने आसाब पर पहरे बिठा दे तो नतीजा ज़ाहिर है।

     

    मंटो की शख़्सियत उर्दू के अफ़साना-निगारों में सबसे ज़्यादा आज़ाद थी। इस मानी में उसने अपने एहसासात पर किसी क़िस्म की बंदिशें नहीं लगाई थीं। जब उसके एहसासात एक-दूसरे से आज़ाद होने लगते थे तो यही चीज़ उसके अफ़साने के लिए मोहलिक (घातक) भी हो जाती थी लेकिन उर्दू में कोई अफ़साना-निगार ऐसा नहीं जो एहसासात की आज़ादी से इतना कम डरता हो। एहसासात और इर्तेआशात (कंपन/स्पंदन) की हलचल में मंटो की शख़्सियत ज़रूर पाश-पाश (टुकड़े-टुकड़े) हो गई। लेकिन अपनी ज़िंदगी और मौत से मंटो ने हमें इतना ज़रूर दिखा दिया है कि फ़नकार (कलाकार) अपना मवाद किस तरह हासिल करता है। क्योंकि उसने मवाद जमा करने का काम बर-सर-ए-आम (खुलेआम) और सबकी नज़रों के सामने किया, इसीलिए उर्दू में उसकी हैसियत महज़ एक अदीब से ज़्यादा है। इसीलिए उसकी मौत उसकी ज़िंदगी की मानियत (सार्थकता) को मुकम्मल करती है और इसीलिए उसके बुरे अफ़सानों को बुरा समझने के बावजूद मैं मंटो को उर्दू का सबसे बड़ा अफ़साना-निगार कहता हूँ।

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