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अज़मत अब्दुल क़य्यूम ख़ाँ

1922 | हैदराबाद, भारत

अज़मत अब्दुल क़य्यूम ख़ाँ के शेर

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मंज़िल पे नज़र आई बहुत दूरी-ए-मंज़िल

बे-साख़्ता आने लगे सब राह-नुमा याद

ज़िंदगानी का लुत्फ़ तो 'अज़्मत'

सिर्फ़ तूफ़ान की पनाह में है

ये बात भी है कि तू भी नहीं है अब मेरा

ये बात भी है कि तेरे सिवा नहीं कोई

रौशनियों के शहर में रह कर

हम अँधेरों से रू-शनास रहे

मौत पहरों उदास रहती है

हम अगर ज़िंदगी से मिलते हैं

ग़म-ए-इमरोज़ का गिला क्यों हो

हुस्न-ए-फ़र्दा मिरी निगाह में है

शुऊर-ए-ज़िंदगी की रौशनी में

शब-ए-ग़म भी सहर से कम नहीं है

फूल किस बे-दिली से हँसते हैं

आप किस बे-दिली से मिलते हैं

मसरूर-ओ-मुतमइन हैं बहुत ताजिरान-ए-वक़्त

क्या ज़िंदगी के ख़्वाब भी नीलाम हो गए

अब ज़माने से और क्या माँगूँ

दौलत-ए-ग़म बहुत ज़ियादा है

पास आए तो कशिश है जमाल-ए-रंगीं

दूर से फूल नज़र आए थे ख़ुश-रू कितने

तज्रबात-ए-ग़म से 'अज़्मत' को मिला

ये शुऊर-ए-फ़न ये अंदाज़-ए-ग़ज़ल

ज़िंदगी तीरगी-ए-शब ही नहीं

सुब्ह की रौशनी भी होती है

कल ये मुमकिन है कि लहराएँ ख़ुशी के गीत भी

हर नज़र में आज इक ख़ामोश सा आलम सही

जो बिजलियों की पनाहों में तुम बना सकते

तो इस क़दर तुम्हें ख़ौफ़-ए-आशियाँ होता

ख़ुदा जाने ज़माना आज किस हालत में रहता है

कि वीरानों से बढ़ कर है चमन-ज़ारों की रुस्वाई

आबाद मय-कदे भी हैं दैर-ओ-हरम भी नहीं

लेकिन आदमी को मिला कोई आदमी

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