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ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

1740 - 1792

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी के शेर

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कभी हाथ भी आएगा यार सच कह

या यूँही तू बातें बनाता रहेगा

यार गर पूछे तो कीजे कुछ अर्ज़

बात पर बात कही जाती है

अदा को तिरी मेरा जी जानता है

हरीफ़ अपना हर कोई पहचानता है

दीन दुनिया का जो नहीं पाबंद

वो फ़राग़त तमाम रखता है

कब इस जी की हालत कोई जानता है

जो जी जानता है सो जी जानता है

है अफ़्सोस उम्र जाने का तेरे

कि तू मेरे पास एक मुद्दत रही है

इश्क़ में दर्द से है हुर्मत-ए-दिल

चश्म को आबरू है आँसू से

हाजी तू तो राह को भूला मंज़िल को कोई पहुँचे है

दिल सा क़िबला छोड़ के तू ने का'बे का एहराम किया

हैं शैख़ बरहमन तस्बीह और ज़ुन्नार के बंदे

तकल्लुफ़ बरतरफ़ आशिक़ हैं अपने यार के बंदे

शब-ए-हिज्र में एक दिन देखना

अगर ज़िंदगी है तो मर जाएँगे

बहर तू इतना उमँड चल मिरे आगे

रो रो के डुबा दूँगा कभी गई गर मौज

ग़ैर वफ़ा में पुख़्ता हैं यूँ ही सही मुझ सा भी

एक तिरी जनाब में ख़ाम रहा तो क्या हुआ

इश्क़ में ख़ूब नीं बहुत रोना

इस से इफ़शा-ए-राज़ होता है

तू जल्दी कर दस्त-ए-जुनूँ नासेह को सीने दे

बहार पहुँची अब कोई ठहरते हैं रफ़ू इस के

और रब्त जिसे कुफ़्र से है या'नी बरहमन

कहता है कि हरगिज़ मिरा ज़ुन्नार टूटे

अबस घर से अपने निकाले है तू

भला हम तुझे छोड़ कर जाएँगे

तुझ बिन इक दल हो पास रहता है

वो भी अक्सर उदास रहता है

गर शैख़ अज़्म-ए-मंज़िल-ए-हक़ है तो इधर

है दिल की राह सीधी का'बे की राह कज

कहूँ कि शैख़-ए-ज़माना हूँ लाफ़ तो ये है

मैं अपने बुत का बरहमन हूँ साफ़ तो ये है

आज़ुर्दा कुछ हैं शायद वर्ना हुज़ूर मुझ से

क्यूँ मुँह फुला रहा है वो गुल-एज़ार अपना

नाचार है दिल ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर के आगे

दीवाने का क्या चलता है ज़ंजीर के आगे

हर कोई अपनी फ़हम-ए-नाक़िस में

पुख़्ता सौदा-ए-ख़ाम रखता है

इश्क़ ने सामने होते ही जलाया दिल को

जैसे बस्ती को लगावे है अदू जंग में आग

आँखों से इसी तरह अगर सैल रवाँ है

दुनिया में कोई घर रहा है रहेगा

देखना ज़ोर ही गाँठा है दिल-ए-यार से दिल

संग-ओ-शीशे को किया है मैं हुनर से पैवंद

जो जी चाहे है देखूँ माह-ए-नौ कहता है दिल मेरा

इधर क्या देखता है अबरू-ए-ख़मदार के बंदे

बहार इस धूम से आई गई उम्मीद जीने की

गरेबाँ फट चुका कुइ दम में अब नौबत ही सीने की

करूँ क़त्-ए-उल्फ़त बुतों से व-लेकिन

ये काफ़िर मिरा दिल नहीं मानता है

जो शैख़ है चाहे है सर-ए-रिश्ता-ए-इस्लाम

क़ाएम रहे तस्बीह का इक तार टूटे

इक आन में जी ले गया मुँह देखते रह गए

कुछ बस नहीं इस माया-ए-तसख़ीर के आगे

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