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मिर्ज़ा दाऊद बेग

- 1754 | औरंगाबाद, भारत

मिर्ज़ा दाऊद बेग के शेर

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शीशा-ए-आबरू सँभाल दिल

दौर उल्टा चला है दुनिया का

शीशा-ए-आबरू सँभाल दिल

दौर उल्टा चला है दुनिया का

देखना है पिया की ज़ुल्फ़-ए-दराज़

या इलाही मुझे दे उम्र-ए-दराज़

देखना है पिया की ज़ुल्फ़-ए-दराज़

या इलाही मुझे दे उम्र-ए-दराज़

'वली' सानी नहीं दाऊद लेकिन

ग़ज़ल कहता है हर इक बा-तलाज़ुम

'वली' सानी नहीं दाऊद लेकिन

ग़ज़ल कहता है हर इक बा-तलाज़ुम

सुन नसीहत मिरी ज़ाहिद-ए-ख़ुश्क

अश्क के आब बिन वुज़ू मत कर

सुन नसीहत मिरी ज़ाहिद-ए-ख़ुश्क

अश्क के आब बिन वुज़ू मत कर

पिव बिना दिल मिरा उदासी है

गाह जोगी है गाह सन्यासी है

पिव बिना दिल मिरा उदासी है

गाह जोगी है गाह सन्यासी है

हर किताब-ए-सोहबत-ए-रंगीं के मअ'नी देख कर

फ़र्द-ए-तन्हाई के मज़मूँ कूँ किया हूँ इंतिख़ाब

हर किताब-ए-सोहबत-ए-रंगीं के मअ'नी देख कर

फ़र्द-ए-तन्हाई के मज़मूँ कूँ किया हूँ इंतिख़ाब

यक क़दम राह-ए-दोस्त है 'दाऊद'

लेकिन अफ़्सोस पा-ए-बख़्त है लंग

यक क़दम राह-ए-दोस्त है 'दाऊद'

लेकिन अफ़्सोस पा-ए-बख़्त है लंग

तुझ हिज्र की अगन कूँ बूझाने संग दिल

कोई आब-ज़न-रफ़ीक़ ब-जुज़ चश्म-ए-तर नहीं

तुझ हिज्र की अगन कूँ बूझाने संग दिल

कोई आब-ज़न-रफ़ीक़ ब-जुज़ चश्म-ए-तर नहीं

साफ़ दिल हो गर है तुझ कूँ ख़्वाहिश-ए-तर्क-ए-हवा

आब-ए-आईना उपर आता नहीं हरगिज़ हबाब

साफ़ दिल हो गर है तुझ कूँ ख़्वाहिश-ए-तर्क-ए-हवा

आब-ए-आईना उपर आता नहीं हरगिज़ हबाब

रक़म करने कूँ वस्फ़-ए-ज़ुल्फ़-ए-दिलदार

मुझे हर वक़्त मश्क़-ए-लाम है बस

रक़म करने कूँ वस्फ़-ए-ज़ुल्फ़-ए-दिलदार

मुझे हर वक़्त मश्क़-ए-लाम है बस

दिया उस ख़ुश-नयन ने रात कूँ मुझ कूँ सुराग़ अपना

किया मैं रोग़न-ए-बादाम सूँ रौशन चराग़ अपना

दिया उस ख़ुश-नयन ने रात कूँ मुझ कूँ सुराग़ अपना

किया मैं रोग़न-ए-बादाम सूँ रौशन चराग़ अपना

सर काट क्यूँ जलाते हैं रौशन दिलाँ के तईं

आहन-दिली पे ख़ल्क़ की ख़ंदाँ हूँ मिस्ल-ए-शम्अ'

सर काट क्यूँ जलाते हैं रौशन दिलाँ के तईं

आहन-दिली पे ख़ल्क़ की ख़ंदाँ हूँ मिस्ल-ए-शम्अ'

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