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मुमताज़ हुसैन के लेख
ग़ालिब एक आफ़ाक़ी शायर
हर बड़े और ओरिजिनल (मौलिक) शायर को ज़िंदगी को देखने, परखने और अपने तजुर्बों में सार्थकता पैदा करने के लिए एक वैश्विक दृष्टिकोण अपनाना पड़ता है। यह वैश्विक दृष्टिकोण एक निजी विचारधारा का रूप भी ले लेता है, जिससे वह अपने दौर की विचारधारा को परखता है। शायर
क़ौमी ज़िंदगी में इलाक़ाई ज़बान और कल्चर की अहमियत
(अप्रैल 1961 में बज़्म-ए-सक़ाफ़त मुल्तान ने जश्न-ए-फ़रीद मनाया था। इस सिलसिले में बज़्म ने एक चर्चा सभा भी आयोजित की थी। चर्चा का विषय था, "क़ौमी ज़िंदगी में क्षेत्रीय कल्चर की अहमियत।" यह तक़रीर उसी चर्चा में की गई थी जिसे बाद में, मैंने "हम क़लम" के
अदब और शख़्सियत
1 / 4 (इस विषय पर कराची यूनिवर्सिटी में एक सिम्पोज़ियम आयोजित हुआ था। मैंने इस विषय पर जो भाषण दिया था उसे बाद में लिख लिया था।) इस विषय के दो विपरीत पहलू हैं। एक तो यह कि साहित्य या कला शख्सियत का इज़हार (अभिव्यक्ति) है और दूसरा यह कि साहित्य
अदब, रिवायत, जिद्दत और जदीदियत
जदीदियत (आधुनिकता) की जो एक लहर इन दिनों चल रही है, उसके मद्देनज़र हमें अपनी साहित्यिक परंपराओं का भी ज़रा जायज़ा लेना चाहिए, लेकिन इससे पहले हमें परंपरा के अर्थ को तय कर लेना चाहिए, ताकि जिद्दत (नवाचार/नयापन) को "जदीदियत" से अलग करके भी देखा जा सके।
रज्अत-पसंद अदब क्या है?
रज्अत पसंद (प्रतिक्रियावादी) साहित्य क्या है? इसकी परिभाषा तय करना इस बात से ज़्यादा मुश्किल है कि तरक़्क़ी पसंद (प्रगतिशील) साहित्य क्या है। क्योंकि तरक़्क़ी का रास्ता सिर्फ़ एक ही होता है और पीछे लौटने की राहें अलग-अलग होती हैं। इंसानी समाज की यह
फ़ैज़ की इन्क़िलाबी शायरी का तग़ज़्ज़ुलाती उस्लूब
मैंने यह शीर्षक इसलिए नहीं चुना है कि फ़ैज़ के शेरों से उनकी ग़ज़लनुमा शैली (तग़ज़्ज़ुलाती उसलूब) की मिसालें पेश करके यह बताऊँ कि कैसे उन्होंने ग़ज़ल की लय (आहंग) और उसकी प्रतीकात्मक (ईमाई) और सांकेतिक (इशाराती) ज़बान में अपने क्रांतिकारी जज़्बात का
हमारा कल्चर और अदब: 1857 ई से पहले और उसके बाद
आज के दिन हिंदुस्तान और पाकिस्तान के तमाम बड़े शहरों में 1857 ई. की आज़ादी की जंग की सौ साला यादगार बड़ी धूमधाम से मनाई जा रही होगी। मगर कितनी हैरत की बात है कि इस सबसे बड़े वाक़ये की पहली यादगार पूरे सौ साल के बाद ही मनाई जा रही है। शायद इसलिए कि सर
तसव्वुफ़ और शायरी
चूँकि इस्लामी दुनिया के इतिहास में तसव्वुफ़ ने एक संगठित आंदोलन और व्यवस्थित अक़ीदे (आस्था) का रूप भी अख्तियार कर लिया था, हालाँकि इसमें अक़ीदों के वैचारिक मतभेद भी बेशुमार रहे, इसलिए तसव्वुफ़ को अंग्रेज़ी शब्द मिस्टिसिज़्म (MYSTICISM) के समान अर्थ वाला
रिसाला दर मारिफ़त-ए-इस्तिआरा
इन्सानों को हैवानों से मुमताज़ करने के लिए फ़लसफ़ियों ने उसे मुख़्तलिफ़ नामों से याद किया है। कहीं किसी ने उसे समाजी हैवान का नाम दिया है तो कहीं किसी ने उसे सियासी हैवान का नाम दिया है। (अरस्तू) नौ’ई ए’तिबार से उसे HOMO SAPIEN या’नी हैवान-ए-नातिक़ ‘आक़िल
सूरत-ओ-मानी
साहित्यिक कारखाने में रूप (फ़ॉर्म) और अर्थ (मीनिंग) के आपसी संबंध को वैज्ञानिक तौर पर खोजना एक बहुत ही मुश्किल काम है, क्योंकि इस मसले पर सिर्फ़ उसी वक़्त से सही रोशनी पड़ने लगी है, जब से द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) का स्कूल वजूद में
दास्तानों की माहियत
जामा मस्जिद दिल्ली के "उत्तरी दरवाज़े की तरफ़ 39 सीढ़ियां हैं। हालाँकि इस तरफ़ भी कबाबी बैठे हैं और सौदे वाले अपनी दुकानें लगाए हुए हैं। लेकिन बड़ा तमाशा इस तरफ़ मदारियों और क़िस्सा-ख़्वानों (क़िस्सा सुनाने वालों) का होता है। तीसरे पहर एक क़िस्सा-ख़्वां
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