रज़ा नक़वी वाही के शेर
है एक बात जो मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू बनती
मिले जो आप तो कम-बख़्त याद ही न रही
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कभी जो ख़िदमत-ए-क़ौमी का पार लेता हूँ
तो मुफ़लिसों की लंगोटी उतार लेता हूँ
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आप को जितने क़वाफ़ी मिल सके फ़रहंग में
उन को ठूँसा ला के ग़ज़लों की क़बा-ए-तंग में
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