- पुस्तक सूची 182677
-
-
पुस्तकें विषयानुसार
-
गतिविधियाँ92
बाल-साहित्य1990
नाटक / ड्रामा926 एजुकेशन / शिक्षण346 लेख एवं परिचय1393 कि़स्सा / दास्तान1607 स्वास्थ्य105 इतिहास3314हास्य-व्यंग611 पत्रकारिता203 भाषा एवं साहित्य1720 पत्र748
जीवन शैली30 औषधि985 आंदोलन273 नॉवेल / उपन्यास4335 राजनीतिक355 धर्म-शास्त्र4790 शोध एवं समीक्षा6635अफ़साना2690 स्केच / ख़ाका244 सामाजिक मुद्दे109 सूफ़ीवाद / रहस्यवाद2043पाठ्य पुस्तक451 अनुवाद4269महिलाओं की रचनाएँ5826-
पुस्तकें विषयानुसार
- बैत-बाज़ी14
- अनुक्रमणिका / सूची4
- अशआर68
- दीवान1290
- दोहा50
- महा-काव्य102
- व्याख्या181
- गीत63
- ग़ज़ल1268
- हाइकु11
- हम्द58
- हास्य-व्यंग31
- संकलन1606
- कह-मुकरनी7
- कुल्लियात585
- माहिया20
- काव्य संग्रह4892
- मर्सिया387
- मसनवी750
- मुसद्दस44
- नात589
- नज़्म1218
- अन्य84
- पहेली15
- क़सीदा183
- क़व्वाली17
- क़ित'अ68
- रुबाई273
- मुख़म्मस15
- रेख़्ती12
- शेष-रचनाएं17
- सलाम34
- सेहरा12
- शहर आशोब, हज्व, ज़टल नामा17
- तारीख-गोई26
- अनुवाद74
- वासोख़्त25
वहीदुद्दीन सलीम
लेख 9
उद्धरण 6
हमारे शो'रा जब ग़ज़ल लिखने बैठते हैं तो पहले उस ग़ज़ल के लिए बहुत से क़ाफ़िए जमा' करके एक जगह लिख लेते हैं, फिर एक क़ाफ़िए को पकड़ कर उस पर शे'र तैयार करना चाहते हैं। ये क़ाफ़िया जिस ख़याल के अदा करने पर मजबूर करता है उसी ख़याल को अदा कर देते हैं। फिर दूसरे क़ाफ़िए को लेते हैं, ये दूसरा क़ाफ़िया भी जिस ख़याल के अदा करने का तक़ाज़ा करता है उसी ख़याल को ज़ाहिर करते हैं, चाहे ये ख़याल पहले ख़याल के बर-ख़िलाफ़ हो। अगर हमारी ग़ज़ल के मज़ामीन का तर्जुमा दुनिया की किसी तरक़्क़ी-याफ़्ता ज़बान में किया जाए, जिसमें ग़ैर-मुसलसल नज़्म का पता नहीं है तो उस ज़बान के बोलने वाले नौ दस शे'र की ग़ज़ल में हमारे शाइ'र के इस इख़तिलाफ़-ए-ख़याल को देखकर हैरान रह जाएं। उनको इस बात पर और भी तअ'ज्जुब होगा कि एक शे'र में जो मज़मून अदा किया गया है, उसके ठीक बर-ख़िलाफ़ दूसरे शे'र का मज़मून है। कुछ पता नहीं चलता कि शाइ'र का असली ख़याल क्या है। वो पहले ख़याल को मानता है या दूसरे ख़याल को। उसकी क़ल्बी सदा पहले शे'र में है या दूसरे शे'र में।
अशआर 2
ग़ज़ल 2
नज़्म 7
पुस्तकें 38
join rekhta family!
-
गतिविधियाँ92
बाल-साहित्य1990
-
