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ज़मीरउद्दीन अहमद की कहानियाँ
ऐ मुहब्बत ज़िंदाबाद
"युवावस्था में होने वाली शदीद क़िस्म की मुहब्बत की कहानी है जिसमें सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों के ज़वाल का नौहा भी है। हवेली के माहौल में पला एक शख़्स जब शहर में रहता है तो अपने अख़लाक़ के बिना पर छोटे बड़े का "भाई जान" बन जाता है। नसी नाम की एक लड़की के वालिद जब उसकी पसंद की शादी करने पर रज़ामंद नहीं होते तो दोनों लोग भाई जान से एक दूसरे को समझाने की दरख़्वास्त करते हैं। भाई जान नसी से अपना मेहनताना माँगते हैं। कुछ कारणों से जब भाईजान नसी के बाप से बात नहीं कर पाते तो नसी समझती है कि मेहनताना न मिलने की वजह से वो टाल रहे हैं और एक दिन वो आकर अज़ारबंद की तरफ़ हाथ बढ़ाते हुए कहती है कि मेरे पास मेहनताना देने के लिए सिवाए इसके कुछ नहीं है।"
सूखे सावन
कम उम्र में बेवा होने वाली एक उस्तानी की नफ़्सियात पर मब्नी कहानी है। उसकी बेटी की शादी हो चुकी है, लेकिन उसकी ख़ूबसूरती का आलम ये है कि न केवल उसकी शिष्या उसके हुस्न की तारीफ़ करती है बल्कि ख़ान साहब का रिश्ता भी आता है। एक दिन रात में वो बारिश में नंगी हो कर नहाती है और ख़ूब रक़्स करती है और फिर थक कर फूलों का हार सिरहाने रखकर सो जाती है।
पक्का गाना
यह अभिजात्य वर्ग की कहानी है। शिबू एक नौजवान लड़की है जो अपने घर में डांसिंग सिखाती है। बाप हर वक़्त किताबों में डूबे रहते हैं, और माँ डाँसिंग पर नाराज़ होती है। शिबू को जब नईम से शदीद क़िस्म की मुहब्बत हो जाती है तो एक दिन अचानक शिबू की माँ हाल में आ जाती हैं और नईम को रम्बा सिखाती हैं और फिर धीरे धीरे नईम और शिबू की माँ एक दूसरे के इश्क़ में मुब्तला हो जाते हैं।
पहली मौत
यह कहानी जगीरदाराना निज़ाम की नैतिकता पर मब्नी है। गाँव का क़ब्र खोदने वाला ग़तोआ मदन को दस रुपये की अदाइगी न होने की वजह से जूतों से मारता है और उसे कंकरों पर घसीटता है। मियाँ के घर का छोटा बच्चा इस ज़ुल्म को बर्दाश्त नहीं कर पाता और वो ग़तोआ के पत्थर खींच मारता है जिससे उसका सर लहू-लुहान हो जाता है। बच्चे को घर में सिर्फ़ इसलिए सज़ा दी जाती है कि वो इन छोटे लोगों के मामले में क्यों पड़ा, अगर वो पलट कर मार देता तो सारी इज़्ज़त ख़ाक में मिल जाती। बच्चा अपने फ़ैसले पर अटल रहता है लेकिन जब उसे माफ़ी माँगने के लिए मजबूर किया जाता है तो उसके अंदर कोई चीज़ टूट जाती है।
अच्छी बेटी
"एक विशेष क्षेत्र में जारी क़त्ल-ओ-ग़ारतगरी के परिदृश्य में लिखी गई कहानी है, जहाँ आए दिन लाशें मिलती रहती हैं और मिलिट्री के लोग उन्हें उठा कर ले जाते हैं। कहानी में दो बहनों के किरदार हैं जिनमें से बड़ी बहन रोज़ाना खिड़की से झाँक कर लाशें देखती है। एक दिन एक लाश की आँतें देखकर उसकी चीख़ निकल गई, उसकी माँ एक दम से घबरा कर आईं और जब उन्हें ख़ौफ़ की वजह मालूम हुई तो उन्होंने सर पर हाथ फेरते हुए सिर्फ़ "मेरी बेटी, अच्छी बेटी" कहा और उसका डर दूर हो गया।"
पहला गाहक
आर्थिक परेशानी की वजह से मजबूर हो कर इस्मत से समझौता करने वाली औरत की कहानी है। मुख़्तार अपने दोस्त तौफ़ीक़ के फ़्लैट में रहता है। नज्मा उसकी बीवी और नाज़ो छोटी सी लड़की है। छः महीने का किराया बाक़ी है जिसके लिए तौफ़ीक़ परेशान कर रहा है और उधर घर में राशन का एक दाना भी नहीं है। नज्मा अपने शौहर और बेटी को बहाने से बाहर भेज देती है, उसी बीच तौफ़ीक़ आ जाता है और वो उसके साथ मोटर पर बैठ कर चली जाती है।
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