मोहम्मद आज़म
ग़ज़ल 34
नज़्म 12
अशआर 18
आसमानों में उड़ा करते हैं फूले फूले
हल्के लोगों के बड़े काम हवा करती है
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अपने जलने का हमेशा से तमाशाई हूँ
आग ये किस ने लगाई मुझे मालूम नहीं
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समझते ही नहीं हैं लोग ना-समझी की मुश्किल को
सुहूलत देखते हैं और समझना छोड़ देते हैं
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कम मा'रका-ए-ज़ीस्त नहीं जंग-ए-उहद से
अस्बाब-ए-जहाँ माल-ए-ग़नीमत की तरह है
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