सिखा दिया है ज़माने ने बे-बसर रहना

वज़ीर आग़ा

सिखा दिया है ज़माने ने बे-बसर रहना

वज़ीर आग़ा

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    सिखा दिया है ज़माने ने बे-बसर रहना

    ख़बर की आँच में जल कर भी बे-ख़बर रहना

    सहर की ओस से कहना कि एक पल तो रुके

    कि ना-पसंद है हम को भी ख़ाक पर रहना

    तमाम उम्र ही गुज़री है दस्तकें सुनते

    हमें तो रास आया ख़ुद अपने घर रहना

    वो ख़ुश-कलाम है ऐसा कि उस के पास हमें

    तवील रहना भी लगता है मुख़्तसर रहना

    सफ़र अज़ीज़ हवा को मगर अज़ीज़ हमें

    मिसाल-ए-निकहत-ए-गुल उस का हम-सफ़र रहना

    शजर पे फूल तो आते रहे बहुत लेकिन

    समझ में सका उस का बे-समर रहना

    अजीब तर्ज़-ए-तकल्लुम है उस की आँखों का

    ख़मोश रह के भी लफ़्ज़ों की धार पर रहना

    वरक़ वरक़ सही उम्र-ए-राएगाँ मेरी

    हवा के साथ मगर तुम उम्र भर रहना

    ज़रा सी ठेस लगी और घर को ओढ़ लिया

    कहाँ गया वो तुम्हारा नगर नगर रहना

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