aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
पहचान: देवबंदी हनफ़ी आलिम, सूफ़ी, चिश्ती, समाज-सुधारक और बहु-ग्रंथकार
मौलाना अशरफ अली थानवी भारतीय उपमहाद्वीप के एक महान इस्लामी विद्वान, सूफ़ी और समाज-सुधारक थे, जिन्होंने इस्लाम की शिक्षा, प्रचार और सामाजिक सुधार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे “बयान-उल-कुरआन” और “बहिश्ती ज़ेवर” जैसी प्रसिद्ध पुस्तकों के लेखक थे और देवबंदी परंपरा के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं।
उनका जन्म 5 रबीउल सानी 1280 हिजरी को थाना भवन (ज़िला मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनके पिता शेख अब्दुल हक़ एक सम्मानित, धार्मिक और संपन्न व्यक्ति थे, जिन्हें फ़ारसी भाषा पर अच्छी पकड़ थी। घर का वातावरण धार्मिक और सुसंस्कृत था, जिसने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया।
बचपन से ही उनका झुकाव धर्म की ओर था। कम उम्र में ही क़ुरआन शरीफ़ हिफ़्ज़ किया और 12 वर्ष की आयु में तहज्जुद की नमाज़ नियमित रूप से पढ़ने लगे।
प्रारंभिक शिक्षा मेरठ और थाना भवन में प्राप्त की। बाद में दारुल उलूम देवबंद में दाखिला लिया और पाँच वर्षों तक उच्च इस्लामी शिक्षा प्राप्त की।
उनके शिक्षकों में मोहम्मद याकूब नानौतवी और रशीद अहमद गंगोही जैसे महान विद्वान शामिल थे। विद्यार्थी जीवन में वे अत्यंत गंभीर और अध्ययनशील थे।
शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने कानपुर के मदरसा फ़ैज़-ए-आम में अध्यापन शुरू किया और लगभग 14 वर्षों तक सेवा दी।
1315 हिजरी में वे थाना भवन लौटे और हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की की ख़ानक़ाह को पुनः जीवित किया तथा मदरसा अशरफ़िया की स्थापना की। यहाँ उन्होंने शिक्षा, आत्म-सुधार और आध्यात्मिक प्रशिक्षण का व्यापक कार्य किया।
उन्होंने बाहरी ज्ञान के साथ आंतरिक शुद्धि पर भी विशेष ध्यान दिया। हज के दौरान उन्होंने हाजी इमदादुल्लाह से बैअत की और बाद में उनसे ख़िलाफ़त प्राप्त की।
उनकी लगभग 800 पुस्तकें बताई जाती हैं, जो आस्था, फ़िक़्ह, सूफ़ीवाद और सामाजिक सुधार जैसे विषयों पर आधारित हैं।
निधन: 16 रजब 1362 हिजरी (20 जुलाई 1943) को उनका देहांत हुआ। उनकी जनाज़ा की नमाज़ ज़फ़र अहमद उस्मानी ने पढ़ाई और उन्हें थाना भवन में दफ़न किया गया।