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चुनिंदा शायरी


ग़ज़ल
अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था
अक्स की सूरत दिखा कर आप का सानी मुझे
अक्स भी कब शब-ए-हिज्राँ का तमाशाई है
अक्स है आईना-ए-दहर में सूरत मेरी
अगर आशिक़ कोई पैदा न होता
अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा
अगर मैं सच कहूँ तो सब्र ही की आज़माइश है
अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है
अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना
अच्छा है वो बीमार जो अच्छा नहीं होता
अच्छी गुज़र रही है दिल-ए-ख़ुद-कफ़ील से
अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है
अच्छे मौसम में तग-ओ-ताज़ भी कर लेता हूँ
अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
अजब कशाकश-ए-बीम-ओ-रजा है तन्हाई
अजब जुनून-ए-मसाफ़त में घर से निकला था
अज़ल से ता-ब-अबद एक ही कहानी है
अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया
अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोई
अतहर तुम ने इश्क़ किया कुछ तुम भी कहो क्या हाल हुआ
अपनी आँखों के समुंदर में उतर जाने दे
अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं
अपनी धूप में भी कुछ जल
अपनी ही रवानी में बहता नज़र आता है
अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या
अपने रहने का ठिकाना और है
अपने हम-राह जला रक्खा है
अफ़्लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर