aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
पढ़िए 34 यहाँ शाइरी की मुख़्तलिफ़ अस्नाफ़ का मुतालिआ करें, जिनमें ग़ज़ल,नज़्म, क़सीदा, रेख़्ती , मस्नवी , गीत और अन्य प्रकार की शाइरी शामिल है।
इस मजमूए में तंज़-ओ-ज़राफ़त पर मबनी शायरी मौजूद है। उर्दू शायरी में इस तकनीक ने लोगों को बहुत मुतअस्सिर किया और और बेशुमार संजीदा शाइरों ने भी इस में तब्अ-आज़माई की।
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"ग़ज़ल" अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है इस के लुग़वी मानी औरतों से बातें करना, या औरतों के मुतअल्लिक़ बातें करना हैं। हैअत के एतिबार से ग़ज़ल औज़ान और बुहूर की रिआयत के साथ साथ हम-क़ाफ़िया और हम-रदीफ़ मिस्रों से बने अशआर का मजमूआ होती है।
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"सलाम" शाइरी की एक ऐसी सिन्फ़ है जो हैअत के एतिबार से ग़ज़ल ही की तरह होती है मगर इस में इमाम हुसैन का ज़िक्र और वाक़ियात-ए-कर्बला के साथ साथ अख़्लाक़ी और तहज़ीबी मज़ामीन भी शामिल होते हैं।
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"गीत" हिन्दी ज़बान का लफ़्ज़ है, जिसके मानी "गाना" और "नग़्मा" के हैं। हैअत के एतिबार से गीत किसी ख़ास मौज़ू का पाबंद नहीं होता। और ये ग़ज़ल, मसनवी, मुसल्लस, मुख़म्मस, और मुसद्दस के पैराए में लिखा जाता है। बहुत से गीत आज़ाद भी लिखे जाते हैं।
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"लोरी" बच्चों के अदब की एक सिन्फ़ है। मौज़ूआत के एतिबार से दर-अस्ल लोरियों में माँ की मोहब्बत और प्यार का इज़हार होता है और इससे बच्चों पर सुकून-बख़्श असरात मुरत्तब होते हैं।
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"मन्क़बत" शायरी की एक ऐसी सिन्फ़ है जिसमें हज़रत अली और दीगर अइम्मा-ए-किराम की तारीफ़-ओ-तौसीफ़ बयान की जाती है। इस की कोई ख़ास हैअत नहीं है मगर बेशतर शोअरा ने उसे क़सीदे की हैअत में लिखा है।
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"मुख़म्मस" ऐसे अशआर के मज्मूए को कहते हैं जो पाँच मिस्रों पर मुश्तमिल हो, जिसमें चार मिस्रे हम-क़ाफ़िया और पाँचवाँ मिस्रा ख़िलाफ़-ए-क़ाफ़िया होता है। बाक़ी के तमाम बंदों में पाँचवें मिस्रे में पहले बंद के पाँचवें मिस्रे की तरह क़ाफ़िए की रिआयत की जाती है।
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"हाइकु" (Haiku) जापानी सिन्फ़-ए-शाइरी है। जो तीन मिस्रों पर मुश्तमिल होती है, जिसमें 17 मुक़त्तआत होते हैं और इस का आहंग और वज़्न पाँच सात पाँच होता है।
"हिन्दी ग़ज़ल" उर्दू ग़ज़ल की तरह ही होती है, जो कम-अज़-कम 5 शेरों का मजमूआ हो और उसे मख़्सूस बहर और क़ाफ़िए की रियाइत के साथ लिखा जाता है।
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"दोहा" हिन्दी, उर्दू शायरी की एक सिन्फ़ है। ये दो हम-क़ाफ़िया मिस्रों से बनता है और हर मिस्रा 24 मात्राओं पर मुश्तमिल होता है । इसका हर मिस्रा दो हिस्सों में तक़्सीम होता है। एक हिस्से में 13 और दूसरे में 11 मात्राएँ होती हैं।
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"रुबाई" शायरी की वो ख़ास सिन्फ़ है जिसमें ख़याल को तसलसुल के साथ चार मिसरों में पेश किया जाता है, इस का पहला दूसरा और चौथा मिसरा हम-क़ाफ़िया होता है, और इस का वस्फ़-ए-ख़ास ये है कि ये कुछ ख़ास बहरों में ही लिखी जाती है।
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शाइरी की एक ऐसी सिनफ़ है जो शादी ब्याह के मौक़ों पर गाई जाती है। हैअत के एतिबार से सेहरा ग़ज़ल, मसनवी, मुसल्लस, मुरब्बा, मुख़म्मस और मुसद्दस के पैराए में लिखा जाता है। मोज़ूई एतिबार से इस में दूलहा और दुल्हन के लिए नेक ख़ाहिशात और दुआएँ शामिल होती हैं।
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"मीरियात" एक जामे मजमूआ है, जिसमें उर्दू शायरी के मशहूर और काबिल-ए-एहतिराम शायर मीर तक़ी मीर के हर दीवान के कलाम को तरतीब-वार शामिल किया गया है।
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इस मज्मूए में वो नादिर ग़ज़लें हैं जो शाइर के दीवान का हिस्सा नहीं हैं और न ही उन्होंने उनको शाया किया। इन ग़ज़लों को रेख़्ता ने मुख़्तलिफ़ माख़ज़ों से हासिल किया है।
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“रुबाई मुस्तज़ाद” ऐसी रुबाई को कहते हैं जिस के मिस्रों के आख़िर में मौज़ूँ अल्फ़ाज़ या फ़िक़्रों का इज़ाफ़ा कर दिया जाए। इस की कोई ख़ास बहर नहीं है उमूमन जिस बहर में अशआर हों उस बह्र से मरबूत फ़िक़्रों का इज़ाफ़ा किया जाता है।
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"पहेली" लफ़्ज़ों के खेल की एक शक्ल है जिसमें पोशीदा मआनी की तलाश की जाती है,उसे आम तौर पर ज़बान की हुनर-मंदी और तख़य्युलाती इस्तिमाल के ज़रीये बच्चों समेत बुज़ुर्गों को चैलेंज और मोह लेने के लिए लिखा जाता है।
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इस मजमूए में फ़िल्मों में इस्तिमाल किए गए मशहूर शाइरों के नग्मों और गीतों को शामिल किया गया है।
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दो हम-वज़्न मिस्रों का मजमूआ शेर या बैत कहलाता है। शेर की जमा अशआर, और बैत की जमा अबयात है। एक शेर में दो मिस्रे होते हैं, पहले मिस्रे को मिस्रा-ए-ऊला और दूसरे को मिस्रा-ए-सानी कहते हैं।
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"अश्रा" अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है,जिसके मानी "दस" होते हैं। ये शायरी की एक सिन्फ़ है जिसमें नज़्म की तरह सिलसिला-वार दस मिस्रे होते हैं।
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"रेख़्ती" उर्दू शाइरी की एक ऐसी सिन्फ़ है जिसमें मर्द शाइर औरतों की ज़बान और लहजे में निस्वानी जज़्बों की शाइरी करता है। ये सिन्फ़ ग़ज़ल की हैअत में लिखी जाती है।
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"मसनवी" एक ऐसी तवील नज़्म को कहते हैं जिसमें किसी क़िस्सा या कहानी को तसलसुल के साथ बयान किया गया हो। मसनवी में हर शेर के दोनों मिस्रे या तो हम- क़ाफ़िया होते हैं या हम-क़ाफ़िया और हम-रदीफ़ होते हैं।
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इस इंतिख़ाब में पंजाबी, मराठी,अंग्रेज़ी और दीगर ज़बानों की शाइरी के उर्दू तर्जुमे मौजूद हैं।
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"वासोख़्त" उर्दू शायरी की एक सिन्फ़ है जिसमें शाइर अपनी वफ़ाओं का ज़िक्र करते हुए महबूब की बे-वफ़ाई और तग़ाफ़ुल का शिकवा करता है और रक़ीब से उस के तअल्लुक़ पर सरज़निश करता है ,नीज़ किसी और से मरासिम क़ायम करने की धमकी भी देता है। आम तौर पर इसे मुसद्दस और मुसम्मन की हयअत में लिखा जाता है।
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"तज़्मीन" से मुराद अपने या किसी दूसरे शायर के मिस्रे पर मिस्रे कहना या मिस्रे लगाना है। इस की कई सूरतें बनती हैं एक मिस्रे पर मिस्रा लगा कर शेर बना लेना या शेर पर एक मिस्रा लगा कर मुसल्लस या शेर पर तीन मिस्रे लगा कर मुख़म्मस कर लेना,इसी तरह चार मिस्रे कह कर शेर को मुसद्दस बना लेना तज़्मीन कहलाता है।
"तरकीब बंद" उर्दू शाइरी की एक ऐसी सिन्फ़ है जो मुख़्तलिफ़ बंदों पर मुश्तमिल होती है। हर बंद हम-वज़्न और हम-क़ाफ़िया शेरों से बनता है नीज़ हर बंद के बाद एक ऐसा शेर लाया जाता है जो वज़्न में मुत्तफ़िक़ हो मगर उस के क़ाफ़िए में इख़्तिलाफ़ पाया जाए।
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"क़ादिर नामा” एक मसनवी है जिसमें ग़ालिब ने फ़ारसी और अरबी अल्फ़ाज़ के हिन्दी या उर्दू मोतरादिफ़ात इस तरह बयान किए हैं कि क़ारेईन की हम-माना अल्फ़ाज़ पर दस्तरस हो जाए।
"क़सीदा" अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है जिसके लुग़वी मानी "नीयत और इरादे" के हैं। क़सीदा शाइरी की एक ऐसी शक्ल और सिन्फ़ है जिसमें शाइर किसी की तारीफ़ बयान करता है।
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"नज़्म" शाइरी की एक ऐसी सिन्फ़ है जो किसी एक उन्वान और मफ़हूम के तहत किसी एक मौज़ू पर लिखी जाती है। जिसका हर शेर या मिस्रा एक दूसरे से मरबूत होता है, और तमाम मिस्रे और शेर मिलकर एक ही मज़्मून को बयान कर रहे होते हैं। नज़्म की एक ख़ास बात ये है कि इस में हैअत की कोई क़ैद नहीं है ये बहर और क़ाफ़िया से पाबंद भी होती है और उन क़ुयूद से आज़ाद भी।
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"हम्द" अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है जिसके मानी "तारीफ़ करना" हैं। इस्तिलाह में नज़्म, शेर या अशआर के उस मजमुए को कहते हैं जिसमें ख़ुदा और उस के सिफ़ात की तारीफ़ की जाती है।
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"नात" अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है जिसके मानी ''तारीफ़ और सना" के हैं। इस्तिलाह में उस कलाम को कहते हैं जिसमें हज़रत-ए- मुहम्मद की मदह की गई हो।
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नस्री नज़्में
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"मर्सिया" अरबी लफ़्ज़ "रसा" से माख़ूज़ है जिसका मतलब है मरने वालों पर मातम करना और उन की फ़ज़ीलत बयान करना। उर्दू शाइरी की इस्तिलाह में ये सिन्फ़ ज़ियादा-तर इमाम हुसैन की तारीफ़ और कर्बला के सानहे के बयान के लिए मख़्सूस है।
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ऐसे अशआर का मजमूआ जिसमें किसी ख़याल को तसलसुल के साथ पेश किया जाए उसे क़िता कहते हैं। ये दो शेरों पर मुश्तमिल होता है और दोनों में बाहमी रब्त ज़रूरी होता है।
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"कह मुकरनी" के मानी हैं "बात कह कर मुकर जाना।" शायरी में ये सिन्फ़ पहेली की तरह होती है जिसमें किसी बात को इस तरह कहा जाता है कि उसके दो मतलब निकलते हों और दोनों सही भी हों, लेकिन जब मुख़ातिब किसी एक मतलब की तरफ़ इशारा करे तो जवाब में शाइर दूसरे मतलब की बात कर दे।
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