अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझो

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझो

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

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    अज़ीज़ो इस को घड़ियाल की सदा समझो

    ये उम्र-ए-रफ़्ता की अपनी सदा-ए-पा समझो

    बजा कहे जिसे आलम उसे बजा समझो

    ज़बान-ए-ख़ल्क़ को नक़्क़ारा-ए-ख़ुदा समझो

    समझो दश्त शिफ़ा-ख़ाना-ए-जुनूँ है ये

    जो ख़ाक सी भी पड़े फाँकनी दवा समझो

    समझ तू कोर-सवादों को हो जो इल्म हो

    अगर समझ भी हो कोर-ए-बे-असा समझो

    पड़े किताब के क़िस्सों में क्या करो दिल साफ़

    सफ़ा हो दिल तो ब-अज़ रौज़तुस-सफ़ा समझो

    हँसे जो वो मिरे रोने पे तो सफ़-ए-मिज़्गाँ

    समझो तुम उसे दीवार-ए-क़हक़हा समझो

    नफ़स की आमद-ओ-शुद है नमाज़-ए-अहल-ए-हयात

    जो ये क़ज़ा हो तो ग़ाफ़िलो क़ज़ा समझो

    तुम्हारी राह में मिलते हैं ख़ाक में लाखों

    इस आरज़ू में कि तुम अपना ख़ाक-ए-पा समझो

    दुआएँ देते हैं हम दिल से तेग़-ए-क़ातिल को

    लब-ए-जराहत-ए-दिल को लब-ए-दुआ समझो

    बहा दिया मिरा ख़ूँ उस ने अपने कूचे में

    उसी को यारो दियत समझो ख़ूँ-बहा समझो

    समझ है और तुम्हारी कहूँ मैं तुम से क्या

    तुम अपने दिल में ख़ुदा जाने सुन के क्या समझो

    तुम्हें है नाम से क्या काम मिस्ल-ए-आईना

    जो रू-ब-रू हो उसे सूरत-आश्ना समझो

    ज़हे नसीब कि हंगाम-ए-मश्क़ तीर-ए-सितम

    हमारे ढेर को तुम तो वो ख़ाक का समझो

    नहीं है कम ज़र-ए-ख़ालिस से ज़र्दी-ए-रुख़्सार

    तुम अपने इश्क़ को 'ज़ौक़' कीमिया समझो

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