यूँही किसी के ध्यान में अपने आप में गाती दो-पहरें

इशरत आफ़रीं

यूँही किसी के ध्यान में अपने आप में गाती दो-पहरें

इशरत आफ़रीं

MORE BYइशरत आफ़रीं

    यूँही किसी के ध्यान में अपने आप में गाती दो-पहरें

    नर्म गुलाबी जाड़ों वाली बाल सुखाती दो-पहरें

    सारे घर में शाम ढले तक खेल वो धूप और छाँव का

    लप्पे पत्ते कच्चे आँगन में लोट लगाती दो-पहरें

    जीवन-डोर के पीछे हैराँ भागती टोली बच्चों की

    गलियों गलियों नंगे पाँव धूल उड़ाती दो-पहरें

    सरगोशी करते पर्दे कुंडी खटकाता नट-खट दिन

    दबे दबे क़दमों से तपती छत पर जाती दो-पहरें

    कमरे में हैरान खड़े आईना जैसे हँसते दिन

    ख़ुद से लड़ कर गौरय्या सी शोर मचाती दो-पहरें

    वही मुज़ाफ़ातों के भेद भरे सन्नाटों वाले घर

    गुड़ियों के लब सी कर उन का ब्याह रचाती दो-पहरें

    खिड़की के टूटे शीशों पर एक कहानी लिखती हैं

    मंढे हुए पीले काग़ज़ से छन कर आती दो-पहरें

    नीम तले वो कच्चे धागे रंगती हुई पुरानी याद

    घेरा डाले छोटी छोटी हाथ बटाती दो-पहरें

    फटी-पुरानी कथरी ओढ़े धूप सेंकते बूढे दिन

    पेशानी तक पल्लू खींचे चिलम बनाती दो-पहरें

    पानी की तक़्सीम के पीछे जलते खेत सुलगते घर

    और खेतों की ज़र्द मुंडेरों पर कुम्हलाती दो-पहरें

    पुर्वाई से लड़ते कितने वरक़ पुरानी यादों के

    सौग़ातों के संदूक़ों को धूप दिखाती दो-पहरें

    दुखती आँखें ज़ख़्मी पोरें उलझे धागों जैसे दिन

    बादल जैसी ओढ़नियों पर फूल खिलाती दो-पहरें

    ओढ़नियों के उड़ते बादल रंगों के बाज़ारों में

    चूड़ी की दूकानों से वो हमें बुलाती दो-पहरें

    सुनते हैं अब उन गलियों में फूल शरारे खिलते हैं

    ख़ून की होली खेल रही हैं रंग नहाती दो-पहरें

    ये तो मेरे ख़्वाब नहीं हैं ये तो मेरा शहर नहीं

    किस जानिब से निकली हैं ये गहनाती दो-पहरें

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