बदले बदले मिरे ग़म-ख़्वार नज़र आते हैं
बदले बदले मिरे ग़म-ख़्वार नज़र आते हैं
मरहले 'इश्क़ के दुश्वार नज़र आते हैं
कश्ती-ए-ग़ैरत-ए-एहसास सलामत यारब
आज तूफ़ान के आसार नज़र आते हैं
इंक़लाब आया न जाने ये चमन में कैसा
ग़ुंचा-ओ-गुल मुझे तलवार नज़र आते हैं
जिन की आँखों से छलकता था कभी रंग-ए-ख़ुलूस
इन दिनों माइल-ए-तकरार नज़र आते हैं
जो सुना करते थे हंस हंस के कभी नामा-ए-शौक़
अब मिरी शक्ल से बेज़ार नज़र आते हैं
उन के आगे जो झुकी रहती हैं नज़रें अपनी
इस लिए हम ही ख़ता-वार नज़र आते हैं
दुश्मन-ए-ख़ू-ए-वफ़ा रस्म-ए-मोहब्बत के हरीफ़
वही क्या और भी दो-चार नज़र आते हैं
जिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत की ख़ुदा ख़ैर करे
बुल-हवस उस के ख़रीदार नज़र आते हैं
वक़्त के पूजने वाले हैं पुजारी उन के
कोई मतलब हो तो ग़म-ख़्वार नज़र आते हैं
जाएज़ा दिल का अगर लो तो वफ़ा से ख़ाली
शक्ल देखो तो नमक-ख़्वार नज़र आते हैं
रोज़-ए-रौशन में अगर उन को दिखाओ तारे
वो ये कह देंगे कि सरकार नज़र आते हैं
हम न बदले थे न बदले हैं न बदलेंगे 'शकील'
एक ही रंग में हर बार नज़र आते हैं
- पुस्तक : Kulliyat-e-Shakiil Badaayuuni (पृष्ठ 583)
- रचनाकार : Shakiil Badaayuuni
- प्रकाशन : Farid Book Depot (Pvt.) Ltd
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