फ़रेबों से न बहलेगा दिल-ए-आशुफ़्ता-काम अपना

महशर इनायती

फ़रेबों से न बहलेगा दिल-ए-आशुफ़्ता-काम अपना

महशर इनायती

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    फ़रेबों से बहलेगा दिल-ए-आशुफ़्ता-काम अपना

    ब-ज़ाहिर मुस्कुरा कर देखने वाले सलाम अपना

    किसी की बज़्म के हालात ने समझा दिया मुझ को

    कि जब साक़ी नहीं अपना तो मय अपनी जाम अपना

    अगर अपने दिल-ए-बेताब को समझा लिया मैं ने

    तो ये काफ़िर निगाहें कर सकेंगी इंतिज़ाम अपना

    मुकम्मल कर गया जल कर हयात-ए-ग़म को परवाना

    और इक हम थे कि अफ़्साना भी छोड़ा ना-तमाम अपना

    जहान-ए-इश्क़ में ऐसे मक़ामों से भी गुज़रा हूँ

    कि बाज़-औक़ात ख़ुद करना पड़ा है एहतिराम अपना

    मैं दीवाना सही लेकिन वो ख़ुश-क़िस्मत हूँ 'महशर'

    कि दुनिया की ज़बाँ पर गया है आज नाम अपना

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