क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है

मिर्ज़ा ग़ालिब

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मिर्ज़ा ग़ालिब

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    INTERESTING FACT

    Sixth sher has been dedicated to the last Mughal Emperor and contemporary of Ghalib and Zauq.

    क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है

    जिस में कि एक बैज़ा-ए-मोर आसमान है

    है काएनात को हरकत तेरे ज़ौक़ से

    परतव से आफ़्ताब के ज़र्रे में जान है

    हालाँकि है ये सीली-ए-ख़ारा से लाला रंग

    ग़ाफ़िल को मेरे शीशे पे मय का गुमान है

    की उस ने गर्म सीना-ए-अहल-ए-हवस में जा

    आवे क्यूँ पसंद कि ठंडा मकान है

    क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसा नहीं दिया

    बस चुप रहो हमारे भी मुँह में ज़बान है

    बैठा है जो कि साया-ए-दीवार-ए-यार में

    फ़रमाँ-रवा-ए-किश्वर-ए-हिन्दुस्तान है

    हस्ती का ए'तिबार भी ग़म ने मिटा दिया

    किस से कहूँ कि दाग़ जिगर का निशान है

    है बारे ए'तिमाद-ए-वफ़ा-दारी इस क़दर

    'ग़ालिब' हम इस में ख़ुश हैं कि ना-मेहरबान है

    देहली के रहने वालो 'असद' को सताओ मत

    बे-चारा चंद रोज़ का याँ मेहमान है

    स्रोत:

    • पुस्तक : Ghair Mutdavil Kalam-e-Ghalib (पृष्ठ 148)
    • रचनाकार : Jamal Abdul Wahid
    • प्रकाशन : Ghalib Academy Basti Hazrat Nizamuddin,New Delhi-13 (2016)
    • संस्करण : 2016
    • पुस्तक : Deewan-e-Ghalib Jadeed (Al-Maroof Ba Nuskha-e-Hameedia) (पृष्ठ 309)
    • रचनाकार : Mufti Mohammad Anwar-ul-haque
    • प्रकाशन : Madhya Pradesh Urdu Academy ,Bhopal (1904-1982)
    • संस्करण : 1904-1982

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