मरहला दिल का न तस्ख़ीर हुआ

बाक़ी सिद्दीक़ी

मरहला दिल का न तस्ख़ीर हुआ

बाक़ी सिद्दीक़ी

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    मरहला दिल का तस्ख़ीर हुआ

    तू कहाँ के इनाँ-गीर हुआ

    काम दुनिया का है तीर-अंदाज़ी

    हम हुए या कोई नख़चीर हुआ

    संग-ए-बुनियादी हैं हम उस घर का

    जो किसी तरह ता'मीर हुआ

    सफ़र-ए-शौक़ का हासिल मा'लूम

    रास्ता पाँव की ज़ंजीर हुआ

    उम्र-भर जिस की शिकायत की है

    दिल उसी आग से इक्सीर हुआ

    किस से पूछें कि वो अंदाज़-ए-नज़र

    कब तबस्सुम हुआ कब तीर हुआ

    कौन अब दाद-ए-सुख़न दे 'बाक़ी'

    जिस ने दो शे'र कहे 'मीर' हुआ

    स्रोत
    • पुस्तक : Bar-e-Safar (पृष्ठ 30)
    • रचनाकार : Baqi Siddiqui
    • प्रकाशन : Maktaba Urdu Daijest, Lahore (1969)
    • संस्करण : 1969

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