रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले

गुलज़ार

रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले

गुलज़ार

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    रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले

    क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले

    उठाए फिरते थे एहसान जिस्म का जाँ पर

    चले जहाँ से तो ये पैरहन उतार चले

    जाने कौन सी मिट्टी वतन की मिट्टी थी

    नज़र में धूल जिगर में लिए ग़ुबार चले

    सहर आई कई बार नींद से जागे

    थी रात रात की ये ज़िंदगी गुज़ार चले

    मिली है शम्अ' से ये रस्म-ए-आशिक़ी हम को

    गुनाह हाथ पे ले कर गुनाहगार चले

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    लता मंगेशकर

    लता मंगेशकर

    स्रोत:

    • पुस्तक : Chand Pukhraj Ka (पृष्ठ 202)
    • रचनाकार : Gulzar
    • प्रकाशन : Roopa And Company (1995)
    • संस्करण : 1995

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