रुमूज़-ए-मस्लहत को ज़ेहन पर तारी नहीं करता

आसी करनाली

रुमूज़-ए-मस्लहत को ज़ेहन पर तारी नहीं करता

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    रुमूज़-ए-मस्लहत को ज़ेहन पर तारी नहीं करता

    ज़मीर-ए-आदमिय्यत से मैं ग़द्दारी नहीं करता

    क़लम शाख़-ए-सदाक़त है ज़बाँ बर्ग-ए-अमानत है

    जो दिल में है वो कहता हूँ अदाकारी नहीं करता

    मैं आख़िर आदमी हूँ कोई लग़्ज़िश हो ही जाती है

    मगर इक वस्फ़ है मुझ में दिल-आज़ारी नहीं करता

    मैं दामान-ए-नज़र में किस लिए सारा चमन भर लूँ

    मिरा ज़ौक़-ए-तमाशा बार-बरदारी नहीं करता

    मुकाफ़ात-ए-अमल ख़ुद रास्ता तज्वीज़ करती है

    ख़ुदा क़ौमों पे अपना फ़ैसला जारी नहीं करता

    मिरे बच्चे तुझे इतना तवक्कुल रास जाए

    कि सर पर इम्तिहाँ है और तय्यारी नहीं करता

    मैं 'आसी' हुस्न की आईना-दारी ख़ूब करता हूँ

    मगर मैं हुस्न की आईना-बरदारी नहीं करता

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    स्रोत:

    • पुस्तक : Ghazal Calendar-2015 (पृष्ठ 07.09.2015)

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