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नज़्म अपनों की तलाश

रियाज़ तौहीदी

नज़्म अपनों की तलाश

रियाज़ तौहीदी

MORE BYरियाज़ तौहीदी

    उस ने जब पहला हमला किया

    तो मैं चुप रहा

    क्यूँकि मैं महफ़ूज़ था

    उस ने जब दूसरा हमला किया

    तौ मैं थोड़ा सा सोचने लगा लेकिन चुप रहा

    क्यूँकि मैं महफ़ूज़ था

    फिर मेरी ख़ुद-ग़र्ज़ी ने मुझे बे हिस कर दिया

    वो लगातार हमला करता रहा और

    मैं लगातार ख़ुद को महफ़ूज़ समझ कर चुप रहा

    सिर्फ़ चुप रहा बल्कि

    हमेशा अपने ही लोगों को

    जज़्बाती और बे-सब्र कहता रहा

    मगर

    अब जबकि मेरी ख़ुद-साख़्ता सोच के साथ साथ

    मेरी गर्दन भी अपनी मर्ज़ी से हिल नहीं सकती है

    तो मेरा ज़मीर बार-बार कोस रहा है

    कि तू अब अपनों का रहा ग़ैरों का

    क्यूँकि तू अपनों की ख़ूबियों को नज़र-अंदाज़ करता रहा

    और ग़ैरों की ख़ामियों को बहाना-बाज़ी से पसंद करता रहा

    अब मेरा वजूद गुम हो चुका है

    क्यूँकि

    मैं अपनों से दूर हो कर सराब के चश्मों में

    अपनों की सूरतें तलाश कर रहा हूँ

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