वो हर्फ़-ए-तन्हा

नून मीम राशिद

वो हर्फ़-ए-तन्हा

नून मीम राशिद

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    रोचक तथ्य

    (Jise Tamanna-e-Vasl-e-Maana)

    हमारे आज़ा जो आसमाँ की तरफ़ दुआ के लिए उठे हैं

    (तुम आसमाँ की तरफ़ देखो!)

    मक़ाम-ए-नाज़ुक पे ज़र्ब-ए-कारी से जाँ बचाने का है वसीला

    कि अपनी महरूमियों से छुपने का एक हीला?

    बुज़ुर्ग-ओ-बरतर ख़ुदा कभी तो (बहिश्त-ए-बर-हक़)

    हमें ख़ुदा से नजात देगा

    कि हम हैं इस सरज़मीं पे जैसे वो हर्फ़-ए-तन्हा

    (मगर वो ऐसा जहाँ होगा) ख़मोश गोया

    जो आरज़ू-ए-विसाल-ए-मअ'नी में जी रहा हो

    जो हर्फ़-ए-मअ'नी की यक-दिली को तरस गया हो

    हमें मुअर्रा के ख़्वाब दे दो

    (कि सब को बख़्शें ब-क़द्र-ए-ज़ौक़-ए-निगह तबस्सुम)

    हमें मुअर्रा की रूह का इज़्तिराब दे दो

    (जहाँ गुनाहों के हौसले से मिले तक़द्दुस के दुख का मरहम)

    कि उस की बे-नूर-ओ-तार आँखें

    दरून-ए-आदम की तीरा रातों

    को छेदती थीं

    उसी जहाँ में फ़िराक़-ए-जाँ-काह-ए-हर्फ़-ओ-मअ'नी

    को देखती थीं

    बहिश्त उस के लिए वो मासूम सादा-लौहों की आफ़ियत था

    जहाँ वो नंगे बदन पे जाबिर के ताज़ियानों से बच के

    राह-ए-फ़रार पाएँ

    वो कफ़्श-ए-पा था कि जिस से ग़ुर्बत की रेग-ए-बर्याँ

    से रोज़-ए-फ़ुर्सत क़रार पाएँ

    कि सुल्ब-ए-आदम की रहम-ए-हव्वा की उज़लतों में

    निहायत-ए-इंतिज़ार पाएँ!

    (बहिश्त सिफ़्र-ए-आज़ीम लेकिन हमें वो गुम-गश्ता हिन्दसे हैं

    बग़ैर जिन के कोई मुसावात क्या बनेगी

    विसाल-ए-मअ'नी से हर्फ़ की बात क्या बनेगी?)

    हम इस ज़मीं पर अज़ल से पीराना-सर हैं माना

    मगर अभी तक हैं दिल तवाना

    और अपनी ज़ूलीदा-कारियों के तुफ़ैल दाना

    हमें मुअर्रा के ख़्वाब दे दो

    (बहिश्त में भी नशात यक-रंग हो तो ग़म है

    हो एक सा जाम-ए-शहद सब के लिए तो सम है)

    कि हम अभी तक हैं इस जहाँ में वो हर्फ़-ए-तन्हा

    (बहिश्त रख लो हमें ख़ुद अपना जवाब दे दो!)

    जिसे तमन्ना-ए-वस्ल-ए-म'अना

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