लोकप्रिय ग़ज़लें

सरल और मनपसंद शायरी का संग्रह



ग़ज़ल
अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए
अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था
अकेले हैं वो और झुँझला रहे हैं
अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई
अगर इस खेल में अब वो भी शामिल होने वाला है
अगर क़दम तिरे मय-कश का लड़खड़ा जाए
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा
अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा
अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना
अच्छा हुआ मैं वक़्त के मेहवर से कट गया
अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए
अच्छा है वो बीमार जो अच्छा नहीं होता
अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है
अच्छे दिन कब आएँगे
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
अजीब ख़्वाहिश है शहर वालों से छुप छुपा कर किताब लिक्खूँ
अजीब ढंग से मैं ने यहाँ गुज़ारा किया
अजीब तौर की है अब के सरगिरानी मिरी
अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोए
अजीब धुँद है आँखों को सूझता भी नहीं
अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो
अज़्मतें सब तिरी ख़ुदाई की
अपना तो ये काम है भाई दिल का ख़ून बहाते रहना
अपनी आँखों के समुंदर में उतर जाने दे
अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है
अपनी धुन में रहता हूँ
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
अपनी ही आवारगी से डर गए
अपने आँचल में छुपा कर मिरे आँसू ले जा
अपने बाद हक़ीक़त या अफ़्साना छोड़ा था
अपने सब यार काम कर रहे हैं
अपने हमराह ख़ुद चला करना
अपने हम-राह जला रक्खा है
अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
अब आएँ या न आएँ इधर पूछते चलो
अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
अब किस से कहें और कौन सुने जो हाल तुम्हारे बाद हुआ
अब के बारिश में तो ये कार-ए-ज़ियाँ होना ही था
अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
अब तक शिकायतें हैं दिल-ए-बद-नसीब से
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
अब तो ये भी नहीं रहा एहसास
अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की
अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया
अब वो मोड़ आया कि हर पल मोतबर होने को है
अभी आँखें खुली हैं और क्या क्या देखने को
अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ
अभी किसी के न मेरे कहे से गुज़रेगा
अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
अभी तो करना पड़ेगा सफ़र दोबारा मुझे
अभी दिल में गूँजती आहटें मिरे साथ हैं
अभी बिछड़ा है वो कुछ रोज़ तो याद आएगा
अभी से कैसे कहूँ तुम को बेवफ़ा साहब
अयादत होती जाती है इबादत होती जाती है
अर्ज़-ओ-समा कहाँ तिरी वुसअत को पा सके
अशआर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
अश्क आँखों में कब नहीं आता
अश्क ढलते नहीं देखे जाते
अश्क-ए-रवाँ की नहर है और हम हैं दोस्तो
अश्क-बारी न मिटी सीना-फ़िगारी न गई
असर उस को ज़रा नहीं होता
आ गई याद शाम ढलते ही
आँख उठाई ही थी कि खाई चोट
आँख ने धोका खाया था या साया था
आँख में आँसू का और दिल में लहू का काल है
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
आँख से आँख मिलाता है कोई
आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते
आँखों में बस के दिल में समा कर चले गए
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
आँखों से किसी ख़्वाब को बाहर नहीं देखा
आइना सामने रखोगे तो याद आऊँगा
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
आईने के आख़िरी इज़हार में
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
आओ तुम ही करो मसीहाई
आग के दरमियान से निकला
आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
आज तक दिल की आरज़ू है वही
आज फिर गर्दिश-ए-तक़दीर पे रोना आया
आज भी दश्त-ए-बला में नहर पर पहरा रहा
आज वीरानियों में मिरा दिल नया सिलसिला चाहता है
आते ही तू ने घर के फिर जाने की सुनाई
आदमी आदमी से मिलता है
आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया
आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए
आप का एतिबार कौन करे
आप की याद आती रही रात भर
आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए
आप ने क़द्र कुछ न की दिल की
आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या
आरज़ू है वफ़ा करे कोई
आसमाँ तक जो नाला पहुँचा है
आसमाँ सा मुझे घर दे देना
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
इंकार ही कर दीजिए इक़रार नहीं तो
इंशा-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या