नई ग़ज़लें

उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह


ग़ज़ल
अंदरूँ नींद का इक ख़ाली मकाँ होता था
अक़्ल दाख़िल हो गई है वहम के मैदान में
अक्स क्या दीदा-ए-तर में देखा
अगर सवाल वो करता जवाब क्या लेता
अगर हम न थे ग़म उठाने के क़ाबिल
अज़ाब-ए-हिज्र भी है राहत-ए-विसाल के साथ
अतवार तिरे अहल-ए-ज़मीं से नहीं मिलते
अदम में क्या अजब रानाइयाँ हैं
अदा-ए-हुस्न की हुस्न-ए-अदा की बात होती है
अधूरे ख़्वाब का चेहरा उदासी
अपना छोड़ा हुआ घर याद आया
अपना दामन देख कर घबरा गए
अपनी आशुफ़्ता तबीअत का मज़ा लेता हूँ
अपनी भीगी हुई पलकों पे सजा लो मुझ को
अपनी वहशत पे रो रहा हूँ मैं
अपने अफ़्क़ार-ओ-अंदाज़ नया देता हूँ
अपने चेहरे पर भी चुप की राख मल जाएँगे हम
अपने ही घर के सामने हूँ बुत बना हुआ
अफ़्सुर्दगी आज़ुर्दगी पज़मुर्दगी बे-कार है
अब आए हो सदा सुन कर गजर की
अब तक जो जी चुका हूँ जनम गिन रहा हूँ मैं
अब तो आँख से इतना जादू कर लेता हूँ
अब वो गली जा-ए-ख़तर हो गई
अब सरगुज़िश्त-ए-हिज्र सुनाने भी आएगा
अय्याम सिर्फ़ शाम-ओ-सहर हो के रह गए
अलम मआल अगर है तो फिर ख़ुशी क्या है
अल्फ़ाज़-ओ-मआनी की करवट जो बदलते हैं
अल्लाह अल्लाह वस्ल की शब इस क़दर एजाज़ है
अश्क आँखों में डर से ला न सके
अश्क इन सीपियों में भर जाएँ
असीर-ए-बज़्म हूँ ख़ल्वत की जुस्तुजू में हूँ
असीर-ए-हल्का-ए-ज़ंजीर-ए-जाँ हुआ है ये दिल
अहल-ए-इश्क़ की हस्ती क्या अजीब हस्ती है
आ गुमाँ से गुज़र के देखेंगे
आँख उठाई नहीं वो सामने सौ बार हुए
आँख का मंज़र-नामा बाँट लिया जाए
आँख तिश्ना भी नहीं होंट सवाली भी नहीं
आँख से ख़्वाब का रिश्ता नहीं रहने देती
आँख है आइना है मशअल है
आँखें जहाँ हों बंद अँधेरा वहीं से है
आँसुओं को रोकता हूँ देर तक
आइने के रू-ब-रू इक आइना रखता हूँ मैं
आईना-ए-ख़याल तिरे रू-ब-रू करें
आख़िरी हिचकी लेगा कौन
आग़ोश-ए-एहतियात में रख लूँ जिगर कहीं
आतश-बजाँ हैं शिद्दत-ए-सोज़-ए-निहाँ से हम
आतिश-ए-इश्क़-ए-बला आग लगाए न बने
आतिश-ए-हिज्र को अश्कों से बुझाने वाले
आधा जिस्म सुलगता आधा जल-थल है
आप को अपना बनाते हुए डर लगता है
आबाद ग़म-ओ-दर्द से वीराना है उस का
आया है ख़याल-ए-बे-वफ़ाई
आरज़ू जुर्म है मुद्दआ जुर्म है
इक इश्क़-ए-ना-तमाम है रुस्वाइयाँ तमाम
इक बात पर बिगड़े गए न जो उम्र-भर मिले
इज़हार-ए-हाल सुन के हमारा कभी कभी
इब्तिदा थी न इंतिहा कुछ देर
इरम के नूर से तीरा मकाँ जलाए गए
इलाज कोई जहाँ का न साज़गार आया
इलाही ख़ैर हो अब अपने आशियाने की
इल्म में झींगर से बढ़ कर कामराँ कोई नहीं
इश्क़ के नाम पे दाइम रहे ज़िंदाँ आबाद
इश्क़ क्या है ग़म-ए-हस्ती का फ़ना हो जाना
इश्क़ वो मश्क है जो लाख छुपाए न छपे
इस इंकिसार का इदराक तुझ को कम होगा
इस दिल से मिरे इश्क़ के अरमाँ को निकालो
इस दुनिया में अपना क्या है
इस दौर का हर आदमी अय्यार हो गया
इस बज़्म-ए-तसव्वुर में बस यार की बातें हैं
इसी सूरत से तस्कीन-ए-दिल-ए-नाशाद करते हैं
उजाला छिन रहा है रौशनी तक़्सीम होती है
उठ रहा है दम-ब-दम डर का धुआँ
उन आँखों का मुझ से कोई वादा तो नहीं है
उन के रुख़ पर निखार का आलम
उन ने किया था याद मुझे भूल कर कहीं
उन ही पेड़ों पे कि सायों का गुमाँ रखते हैं
उमीद कोई नहीं आसरा भी कोई नहीं
उम्मीद-ए-शौक़ हो या वादा-ए-राहत-ٖफ़िज़ा कोई
उम्र गुज़री है कामरानी से
उम्र-भर ख़ून से लिक्खा है जिस अफ़्साने को
उरूज उस के लिए था ज़वाल मेरे लिए
उस का जवाब मिलना जहाँ में मुहाल है
उस की तस्वीर क्या लगी हुई है
उस ने निगाह-ए-लुत्फ़-ओ-करम बार बार की
एक आँसू गिरा सोचते सोचते
एक तस्वीर जो तश्कील नहीं हो पाई
एक मंज़र कहकशानी इक ख़त-ए-बर-आब भी
एक मुद्दत से तुझे दिल में बसा रक्खा है
एक है फिर भी है ख़ुदा सब का
एहसास का क़िस्सा है सुनाना तो पड़ेगा
ऐ क़लंदर आ तसव्वुफ़ में सँवर कर रक़्स कर
ऐ जुनूँ दश्त में दीवार कहाँ से लाऊँ
ऐ सालिक इंतिज़ार-ए-हज में क्या तू हक्का-बक्का है
ऐसा भी नहीं दर्द ने वहशत नहीं की है
ऐसी उलझन हो कभी ऐसी भी रुस्वाई हो
क़द से कुछ मावरा चराग़ जले
क़दम-ए-ख़ुश-बदनाँ शोबदा-गर है कि नहीं
क़द्र-ए-वफ़ा भी होगी किसी दिन जफ़ा के बाद
कभी अज़ाब कभी एक ताज़ियाना है
कभी अज़ाबों में बस रही है कभी ये ख़्वाबों में कट रही है