नई ग़ज़लें

उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह


ग़ज़ल
अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का
अपनी तन्हाई का सामान उठा लाए हैं
अपने हिस्से की अना दूँ तो अना दूँ किस को
अब कोई और मुसीबत तो न पाली जाए
अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया
आ कर उरूज कैसे गिरा है ज़वाल पर
आइना है ख़याल की हैरत
आइने से गुज़रने वाला था
आख़िर बिगड़ गए मिरे सब काम होने तक
आज फिर रू-ब-रू करोगे तुम
आज शब-ए-मेराज होगी इस लिए तज़ईन है
आम रस्ते से हट के आया हूँ
इक तरफ़ प्यार है रिश्ता है वफ़ादारी है
इश्क़ क्या है बेबसी है बेबसी की बात कर
इश्क़ में तेरे जान-ए-ज़ार हैफ़ है मुफ़्त में चली
इश्क़ से मैं डर चुका था डर चुका तो तुम मिले
इस अरसा-ए-महशर से गुज़र क्यूँ नहीं जाते
उस का हाल-ए-कमर खुला हमदम
उस निगाह-ए-नाज़ ने यूँ रात-भर तज्सीम की
एक इक पल तिरा नायाब भी हो सकता है
एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं
ऐ उम्र-ए-नाज़ तुझ को गुज़ारे गुज़र न था
ऐ काश हो बरसात ज़रा और ज़रा और
ऐ ज़ौक़ अर्ज़-ए-हुनर हर्फ़-ए-एतिदाल में रख
ऐ दिल तिरे तुफ़ैल जो मुझ पर सितम हुए
कभी जो उस की तमन्ना ज़रा बिफर जाए
कितना कमज़ोर है ईमान पता लगता है
किसी गोशे में दुनिया के मकीं होते हुए भी
क़िस्मत अपनी ऐसी कच्ची निकली है
कैसा मंज़र गुज़रने वाला था
क्यूँ हर तरफ़ तू ख़्वार हुआ एहतिसाब कर
ख़ुद मुझ को मेरे दस्त-ए-कमाँ-गीर से मिला
ख़ुश बहुत आते हैं मुझ को रास्ते दुश्वार से
ख़ुशियाँ मत दे मुझ को दर्द-ओ-कैफ़ की दौलत दे साईं
ग़फ़लत में फ़र्क़ अपनी तुझ बिन कभू न आया
गर दिल में कर के सैर-ए-दिल-ए-दाग़-दार देख
गुलों पर साफ़ धोका हो गया रंगीं कटोरी का
चमका जो तीरगी में उजाला बिखर गया
चमन में रह के भी क्यूँ दिल की वीरानी नहीं जाती
चश्म-ए-ख़ुश-आब की तमसील में रहने वाले
जब कभी दर्द की तस्वीर बनाने निकले
जब जज़्बा इक बार जिगर में आता है
ज़माना कुछ भी कहे तेरी आरज़ू कर लूँ
जानने के लिए बेताब था अग़्यार का हाल
जिस्म को जीने की आज़ादी देती हैं
जो कहा था तुम्हें सुना भी था
जो मिरी पुश्त में पैवस्त है उस तीर को देख
जो साक़िया तू ने पी के हम को दिया है जाम-ए-शराब आधा
तलातुम है न जाँ-लेवा भँवर है
तुझे भी हुस्न-ए-मुत्लक़ का अभी दीदार हो जाए
तेरी तस्वीरों को देख पिघलती हैं
दरिया गुज़र गए हैं समुंदर गुज़र गए
दर्द की साकित नदी फिर से रवाँ होने को है
दर्स लेंगे दिल के इक बे-रब्त अफ़्साने से क्या
दिल ने मेरी नहीं सुनी तौबा
दिल भी जैसे हमारा कमरा था
दुनिया को जब नज़दीकी से देखा है
न कारवाँ का हमारे कोई निशान रहा
न बख़्शा गुल को भी दस्त-ए-क़ज़ा ने
न हो ठिकाना कोई जिस का तेरे घर के सिवा
निहत्ते आदमी पे बढ़ के ख़ंजर तान लेती है
पाई हमेशा रेत भँवर काटने के बाद
पिन्हाँ था ख़ुश-निगाहों की दीदार का मरज़
पुतली की एवज़ हूँ बुत-ए-राना-ए-बनारस
पूछते हैं तुझ को सफ़्फ़ाकी कहाँ रह कर मिली
फिर आज दर्द से रौशन हुआ है सीना-ए-ख़्वाब
बरसों से हूँ मैं ज़मज़मा-परदाज़-ए-मोहब्बत
ब-वक़्त-ए-शाम उमीदों का ढल गया सूरज
बाक़ी न हुज्जत इक दम-ए-इसबात रह गई
बानी-ए-शहर-ए-सितम मज़लूम कैसे हो गया
बे-ज़बानों को भी गोयाई सिखाना चाहिए
मरकज़-ए-हर्फ़ तकल्लुम था बयाँ तक न हुआ
माज़ी के जब ज़ख़्म उभरने लगते हैं
मिरे वजूद की गहराइयों में रहता है
मिलता है क़ैद-ए-ग़म में भी लुत्फ़-ए-फ़ज़ा-ए-बाग़
मिसाल-ए-मुश्क ज़बाँ से मिरी फ़साना गया
मैं केवल अब ख़ुद से रिश्ता रक्खूँगा
यक़ीं की हद को जा पहुँचा जो पहले था गुमाँ अपना
यगाना उन का बेगाना है बेगाना यगाना है
यार के नर्गिस-ए-बीमार का बीमार रहा
यूँ सितम ढाए गए हैं तिरे दीवाने पर
ये कौन है जो सर-ए-रोज़गार आया है
ये जी में आता है जल जल के हर ज़माँ नासेह
ये बातों ही बातों में बातें बदलना
ये बारीक उन की कमर हो गई
ये बोले जो उन को कहा बे-मुरव्वत
रग-ओ-पै में भरा है मेरे शोर उस की मोहब्बत का
लबों पर प्यास सब के बे-कराँ है
लूटे मज़े जो हम ने तुम्हारे उगाल के
वो जो करते थे बात बात का ग़म
वो बहुत ख़ुश है ख़िताबात-ओ-मुराआत के साथ
शरफ़ इंसान को कब ज़िल्ल-ए-हुमा देता है
शिकस्ता जिस्म दरीदा जबीन की जानिब
शोरिश-ए-हर्फ़ है अयाग़ में कुछ
सच कहने का आख़िर ये अंजाम हुआ
सच की ख़ातिर सब कुछ खोया कौन लिखेगा
सफ़र का सिलसिला आख़िर कहाँ तमाम करूँ
समझ में ज़िंदगी आए कहाँ से
समुंदर से किसी लम्हे भी तुग़्यानी नहीं जाती
सर्दी-ओ-गर्मी-ओ-बरसात में आ जाता है
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