नई ग़ज़लें

उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह


ग़ज़ल
अक्स आसेब आइना जंगल
अक्स मंज़र में पलटने के लिए होता है
अगर इन बाज़ूओं में दम नहीं है
अगर ग़म तेरा ग़म है तो कोई ग़म से रिहा क्यूँ हो
अगर जो प्यार ख़ता है तो कोई बात नहीं
अगर बात तेरी हो प्यारी लगे
अपनी क़िस्मत का सितारा सर-ए-मिज़्गाँ देखा
अपनी ही आवाज़ को बे-शक कान में रखना
अब अपने दीदा-ओ-दिल का भी एतिबार नहीं
अब आफ़्ताब-ए-मुनव्वर पे क़ुर्ब-ए-शाम हुआ
अब किसी को नहीं मिरा अफ़्सोस
अब किसे यारा है ज़ब्त-ए-नाला-ए-ओ-फ़र्याद का
अब के मौसम में कोई ख़्वाब सजाया ही नहीं
अब बाद-ए-फ़ना किस को बताऊँ कि मैं क्या था
अब्र उट्ठा तो सुबू याद आया
अभी तवक़्क़ो बनाए रखना अभी उमीदें जगाए रहना
अमीर-ए-शहर की चौखट पे जा के लौट आया
अहल-ए-ग़म से इशरत-ए-आलम का सामाँ हो गया
आ गए हो तो रहो साथ सहर होने तक
आ मिरी चश्म-ए-पुर-ख़ुमार में आ
आँख पड़ते ही न था नाम शकेबाई का
आँख रक्खे हुए सितारे पर
आँख से हिज्र गिरा दिल ने दुहाई दी है
आँखें दे आईना दे
आँखों देखी बात कहानी लगती है
आइना सामने रखा होगा
आईना-ए-ख़याल था अक्स-पज़ीर राज़ का
आईना-ए-रंगीन-ए-जिगर कुछ भी नहीं क्या
आओ तो बहल जाए मेरा दिल-ए-दीवाना
आओ ना मुझ में उतर जाओ ग़ज़ल होने तक
आख़िरी मारका अब शहर-ए-धुआँ-धार में है
आज तक फिरता रहा मैं तुझ में ही खोया हुआ
आने-जाने का है ये रस्ता क्यूँ
आप से झुक के जो मिलता होगा
आरज़ू को दिल ही दिल में घुट के रहना आ गया
आरज़ू तुझ से तिरा बोसा भी कब माँगे है
आरज़ू रखना मोहब्बत में बड़ा मज़्मूम है
आरज़ूओं के धड़कते शहर जल कर रह गए
आसमाँ पर है दिमाग़ उस का ख़ुद-आराई के साथ
आह भरता हूँ तो भरने भी नहीं देता है
आह शर्मिंदा-ए-असर न हुई
आह-ओ-नाला ने कुछ असर न किया
इंक़िलाबी सोच शाइर का क़लम अपनी जगह
इंसान के लिए इस दुनिया में दुश्नाम से बचना मुश्किल है
इक क़यामत वक़्त से पहले बपा होने को है
इक क़यामत है जवानी इक क़यामत है शबाब
इक ख़्वाब के असर में कई दिन गुज़र गए
इक नज़र मुड़ के मुझे देख ऐ जाने वाले
इक यादगार चाहिए कोई निशाँ रहे
इतना मोहतात कि जुम्बिश नहीं करने देगा
इरफ़ान है ये इश्क़ के सोज़-ओ-गुदाज़ का
इर्तिबात-ए-बाहमी शैख़-ओ-बरहमन में नहीं
इलाही दिल को मेरे कुछ ख़ुशी होती तो अच्छा था
इश्क़ की इतनी बढ़ीं रानाइयाँ
इश्क़ को कामयाब होना था
इस अंधे क़ैद-ख़ाने में कहीं रौज़न नहीं होता
इस इश्क़ में दरकार कहानी है ज़रूरी
इस के हाथों से जो ख़ुशबू-ए-हिना आती है
इसी का नाम है दीवाना बनना और बना देना
इसी ख़याल से दिल में मिरे उजाला है
ईद हो जाए अभी तालिब-ए-दीदारों को
उन को ख़ला में कोई नज़र आना चाहिए
उन को सब लगते हैं चेहरे ख़ूबसूरत
उन से दो आँख से आँसू भी बहाए न गए
उन्हीं बातों से उस की ख़ू बिगड़ी
उम्र लम्बी तो है मगर बाबा
उम्र-भर सीने में इक दर्द दबाए रक्खा
उस की आँखों में कुछ नमी सी है
उस को तुम मेरे तअल्लुक़ का हवाला देते
उस ने यूँ रास्ता दिया मुझ को
उसे पाने की करते हो दुआ तो
एक काफ़िर से मोहब्बत हो गई
एक सदी में बीता हूँ
एहतिमाम-ए-रंग-ओ-बू से गुलिस्ताँ पैदा करें
ऐ जान हुस्न-ए-अफ़सर-ए-ख़ूबाँ तुम्हीं तो हो
ऐ दिल उस ज़ुल्फ़ की रखियो न तमन्ना बाक़ी
ऐ दोस्त मैं ख़ामोश किसी डर से नहीं था
ऐसा मंज़र तो कभी देखा न था
और जीते रहें कि मर जाएँ
कई सवाल मचलते हैं हर सवाल के बाद
कब मेरे वास्ते कोई मुश्किल नहीं रही
कब वो भला हमारी मोहब्बत में आ गए
कभी जो शब की सियाही से ना-गहाँ गुज़रे
कभी टूटा न अफ़्सून-ए-सितम तेरी हुज़ूरी का
कभी तो मूँद लें आँखे कभी नज़र खोलें
करना है ज़िंदगी जो क़फ़स में बसर मुझे
क़हक़हों की ज़द से ये गौहर छुपा
कहते हैं अब है शौक़ मुलाक़ात का मुझे
कहते हैं जिस को मौत है वक़्फ़ा हयात का
कहाँ कहाँ तिरी रंगीनी-ए-शबाब नहीं
क़ासिद नहीं ये वक़्त सवाल-ओ-जवाब का
कितना दिलकश फ़रेब-ए-हस्ती है
कितना हुशियार हुआ कितना वो फ़रज़ाना हुआ
कितनी सच्चाई किस ख़बर में है
किस ख़ुशी की तलब नहीं दिल में
किस राह पे हैं रवाँ-दवाँ हम
किस से दिल बहलाऊँ मैं
किसी की आँख से सपने चुरा कर कुछ नहीं मिलता
किसी की ज़ीस्त का बस एक बाब सन्नाटा
किसी ख़ता से हमें इंहिराफ़ थोड़ी है
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