उर्दू ज़बान-ओ-अदब की अपनी एक भरपूर परंपरा रही है, जिसमें ज़िंदगी, समाज और शेर-ओ-अदब से जुड़े तजरबों, ख़यालों और एहसासों की वसीअ दुनिया आबाद है। स्कॉलर्स और आलोचकों ने इस पर मुख़्तलिफ़ ज़ावियों और पहलुओं से लिखा है। यह इल्मी और अदबी ज़ख़ीरा लंबे लेखों की शक्ल में मौजूद है। रेख़्ता स्कॉलर इसी ज़ख़ीरे तक पहुँचने की एक कोशिश है, जहाँ इन लेखों की अहम और दिलचस्प बातों को छोटे और आसान रूप में पेश किया गया है।
क्लासिकी ग़ज़ल में इंशाइया (सवालिया) अंदाज़ को ख़बरिया अंदाज़ पर ज़्यादा अहमियत हासिल है क्योंकि यह शेर में मानी (अर्थ) की अनगिनत संभावनाएँ पैदा करता है।
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