शायरी और जीवनी: उर्दू तनक़ीद की एक बुनियादी ग़लत-फ़हमी
उर्दू तनक़ीद (आलोचना) में यह ख़याल आम रहा है कि सच्ची शायरी, शायर की आप-बीती होती है, इस मज़मून (लेख) में इस नज़रिए की ख़ामियों और क्लासिकी ग़ज़ल पर इसके बुरे असर का जायज़ा लिया गया है।
Added to your favorites
उर्दू तनक़ीद (आलोचना) में यह ख़याल आम रहा है कि सच्ची शायरी, शायर की आप-बीती होती है, इस मज़मून (लेख) में इस नज़रिए की ख़ामियों और क्लासिकी ग़ज़ल पर इसके बुरे असर का जायज़ा लिया गया है।
यह मज़मून इस बात पर रोशनी डालता है कि उर्दू की लिपि बदलकर उसे रोमन या देवनागरी में करने की तजवीज़ (प्रस्ताव) दरअस्ल उर्दू ज़बान और इसके सदियों पुराने अदबी सरमाये (साहित्यिक खज़ाने) को मौत के घाट उतारने के बराबर है।
यह लेख अल्लामा इक़बाल की शायरी में ध्वन्यात्मक लय, ख़ास तौर पर सफ़ीरी (Sibilants) और मुसलसल (Continuants) आवाज़ों के बहुत ज़्यादा इस्तेमाल और उनसे पैदा होने वाले माहौल का विश्लेषण करता है।
इस मज़मून (लेख) में इस बात का जायज़ा लिया गया है कि अल्लामा इक़बाल ने अपनी शायरी में उर्दू की भारी-भरकम हकार (Aspirated) और माकूसी (Retroflex) आवाज़ों का इस्तेमाल कितना कम किया है और इससे उनके शायरी के अंदाज़ पर क्या असर पड़ा है।
मौलाना हाली की 'यादगार-ए-ग़ालिब' में दर्ज इस मशहूर क़िस्से का आलोचनात्मक और ऐतिहासिक जायज़ा कि क्या वाक़ई मीर तक़ी मीर ने ग्यारह साल के ग़ालिब के शेर सुनकर उनके एक अज़ीम शायर बनने की भविष्यवाणी की थी।
हिंदी इल्म-ए-बदीअ (अलंकार शास्त्र) में इंसानी जज़्बात और एहसासात को नौ (9) क़िस्मों में बाँटा गया है, जिसे अल्लामा शिबली अरबी और फ़ारसी के मुक़ाबले में ज़्यादा वैज्ञानिक मानते हैं।
अल्लामा शिबली नोमानी ने ब्रज भाषा के सनाए-ओ-बदाए (अलंकार) की अरबी और फ़ारसी की सनअतों से तुलना करते हुए हिंदी शायरी की ख़ूबसूरती और ख़यालों की नज़ाकत को उजागर किया है।
ग़ज़ल में शायरों के ख़ास मज़मून (जैसे ग़ालिब का रश्क या मीर की ख़ुद्दारी) उनकी निजी विशेषताएँ नहीं बल्कि कलात्मक मज़मून-आफ़रीनी (विषय-रचना) का हिस्सा होते हैं।
शेर शाह सूरी के दौर के महान शायर मलिक मुहम्मद जायसी की मसनवी 'पद्मावत' की समीक्षा, जिसने खालिस भाषा में हिंदू कवियों को भी पीछे छोड़ दिया।
उर्दू ज़बान का अस्ल नाम 'हिंदी' था, जिसे अंग्रेज़ों ने अपनी 'बाँटो और राज करो' की नीति के तहत 'उर्दू' या 'लश्करी ज़बान' का नाम दे दिया।
ग़ज़ल की सबसे बड़ी शर्त शब्दों का कम से कम और सही इस्तेमाल है। ग़ैर-ज़रूरी शब्दों (हश्व) और बात पूरी न कर पाने (इज्ज़-ए-नज़्म) से शेर की ख़ूबसूरती तबाह हो जाती है।
यह लेख साहित्य और इतिहास के बीच सदियों पुरानी बहस का जायज़ा लेता है, जिसमें प्लेटो के नज़रिया-ए-नक़्ल (अनुकरण सिद्धांत) और अरस्तू की हैयत-पसंदी (रूपवाद) के बीच कश्मकश और उर्दू साहित्य पर उसके प्रभावों को बयान किया गया है।
अमीर ख़ुसरो, सूफ़ी बुज़ुर्गों और भक्ति तहरीक के संतों ने किस तरह उर्दू और हिंदी की मुश्तरका (साझा) ज़बान को अवाम के दिलों तक पहुँचने का ज़रिया बनाया।
ज़ेहनी बनावट की समानता के बा-वुजूद, मीर की शायरी एक विशाल और हलचल भरे शहर की तरह है, जबकि ग़ालिब का कलाम एक सजा-धजा और तिलिस्मी दीवान-ख़ाना है।
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी उन आलोचकों का सख़्ती से खंडन करते हैं जो मीर की ग़ज़लों को उनकी आत्मकथा या अठारहवीं सदी के सामाजिक हालात का सीधा-सीधा अक्स मानते हैं।
इस्तिआरा (रूपक) और अलामत (प्रतीक) के बीच के नाज़ुक फ़र्क़ की वज़ाहत; इस्तिआरा मुशाहिदे (अवलोकन) पर आधारित होता है, जबकि अलामत एक गहरे इल्म (ज्ञान) और कई मानी को ज़ाहिर करती है।
कबीर ने अपने पेशे यानी कपड़ा बुनने की शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए इंसानी ज़िंदगी, रूह और कायनात के पेचीदा फ़लसफ़े को एक निहायत ख़ूबसूरत और अछूते रूपक में ढाल दिया।
वली दकनी की ज़बान और शायरी अचानक वजूद में नहीं आई, बल्कि यह औरंगाबाद के ख़ास भाषाई माहौल और हसन शौक़ी जैसे उनसे पहले के शाइरों की देन थी।
मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली के नज़दीक तख़य्युल (Imagination) वह फ़ितरी (प्राकृतिक) और बुनियादी सलाहियत है जो एक शायर को ग़ैर-शायर से अलग करती है और नामुमकिन चीज़ों को मुमकिन बनाकर पेश करने की ताक़त रखती है।
ग़ालिब की मुश्किल-पसंदी का अस्ल राज़ उनके इस्तिआरे (रूपक) के इस्तेमाल में छिपा है, जहाँ वे विरोधी सच्चाइयों को मिलाकर एक ऐसी बहुआयामी सच्चाई रचते हैं जिसे शेर से अलग नहीं किया जा सकता।
Subscribe to Rekhta Newsletter to get all the latest updates