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नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
जब घुली तेरी राहों में शाम-ए-सितम
हम चले आए लाए जहाँ तक क़दम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
ख़ुद-ब-ख़ुद नींद सी आँखों में घुली जाती है
महकी महकी है शब-ए-ग़म तिरे बालों की तरह
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
तराना-ए-मिल्ली
मग़रिब की वादियों में गूँजी अज़ाँ हमारी
थमता न था किसी से सैल-ए-रवाँ हमारा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ऐ रहीन-ए-ख़ाना तू ने वो समाँ देखा नहीं
गूँजती है जब फ़ज़ा-ए-दश्त में बाँग-ए-रहील
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
उमीद
मा'सूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा
हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जश्न-ए-ग़ालिब
जिन शहरों में गूँजी थी ग़ालिब की नवा बरसों
उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशाँ ठहरी








