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असग़र गोंडवी

1884 - 1936 | गोण्डा, भारत

प्रख्यात पूर्व-आधुनिक शायर, अपने सूफ़ियाना लहजे के लिए प्रसिद्ध।

प्रख्यात पूर्व-आधुनिक शायर, अपने सूफ़ियाना लहजे के लिए प्रसिद्ध।

असग़र गोंडवी

ग़ज़ल 38

अशआर 54

चला जाता हूँ हँसता खेलता मौज-ए-हवादिस से

अगर आसानियाँ हों ज़िंदगी दुश्वार हो जाए

अक्स किस चीज़ का आईना-ए-हैरत में नहीं

तेरी सूरत में है क्या जो मेरी सूरत में नहीं

ज़ाहिद ने मिरा हासिल-ए-ईमाँ नहीं देखा

रुख़ पर तिरी ज़ुल्फ़ों को परेशाँ नहीं देखा

एक ऐसी भी तजल्ली आज मय-ख़ाने में है

लुत्फ़ पीने में नहीं है बल्कि खो जाने में है

आलम से बे-ख़बर भी हूँ आलम में भी हूँ मैं

साक़ी ने इस मक़ाम को आसाँ बना दिया

पुस्तकें 48

वीडियो 4

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ऑडियो 21

आलाम-ए-रोज़गार को आसाँ बना दिया

आशोब-ए-हुस्न की भी कोई दास्ताँ रहे

इक आलम-ए-हैरत है फ़ना है न बक़ा है

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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