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नज़्म
बच्चों की क़व्वाली
हलवे के लिए फिर आज भी हम इक आस लगाए बैठे हैं
जो बात ज़बाँ पर ला न सके वो दिल में छुपाए बैठे हैं
शौकत परदेसी
नज़्म
काले सफ़ेद परों वाला परिंदा और मेरी एक शाम
सीरत-ए-नबवी, तर्क-ए-दुनिया और मौलवी-साहब के हलवे मांडे में क्या रिश्ता है?
दिन तो उड़ जाते हैं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
शब-बरात
क्यूँकर करे न अपनी नुमूदारी शब-बरात
चिलपक चपाती हलवे से है भारी शब-बरात
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अब और तब
उसी मालिक को फिर हलवे की दावत पर बुलाते हैं
वो हलवा ख़ूब खाते हैं उसे भी कुछ खिलाते हैं
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
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ग़ज़ल
हलवे मांडे सब मीठे थे खा पी कर वो भूल गए
तल्ख़ अनासिर का संगम था रग रग में रह गया नमक