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शेर
आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ
या इश्क़ की पकड़ कर गर्दन मरोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
शाम-ए-अयादत
कि जिस को सुनते ही हुकूमतों के रंग-ए-रुख़ उड़ें
चपेटें जिन की सरकशों की गर्दनें मरोड़ दें
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ
या इश्क़ की पकड़ कर गर्दन मरोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
हास्य
खालिद इरफ़ान
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नज़्म
परिंदा कमरे में रह गया
एक आदमी पुराने कैलन्डर पर निशान लगा रहा था
दूसरा नया कैलन्डर हाथ में मरोड़ रहा था
सारा शगुफ़्ता
ग़ज़ल
है मुद्दतों से तेरे इंतिज़ार में भी इक लहद
भलाई चाहे वाँ तो नफ़्स अपना कुछ मरोड़ तू
