ताबिश देहलवी
ग़ज़ल 24
अशआर 5
अभी हैं क़ुर्ब के कुछ और मरहले बाक़ी
कि तुझ को पा के हमें फिर तिरी तमन्ना है
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अभी हैं क़ुर्ब के कुछ और मरहले बाक़ी
कि तुझ को पा के हमें फिर तिरी तमन्ना है
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छोटी पड़ती है अना की चादर
पाँव ढकता हूँ तो सर खुलता है
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छोटी पड़ती है अना की चादर
पाँव ढकता हूँ तो सर खुलता है
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पुस्तकें 7
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