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कहानी
प्रेमचंद
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ग़ज़ल
जगदीश प्रकाश
नज़्म
ज़िंदगी
इन अमीरों के मोहल्लों को ज़रा सा छोड़ कर
पास की कच्ची सी बस्ती में कभी चलिए हुज़ूर
मारूफ़ रायबरेलवी
ग़ज़ल
शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं
मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे
जौन एलिया
ग़ज़ल
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ये ख़िज़ाँ की ज़र्द सी शाल में जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है उसे आँसुओं से हरा करो
बशीर बद्र
नज़्म
शिकवा
ख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहीं
अपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहीं


