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नज़्म
एक रह-गुज़र पर
गुदाज़ जिस्म क़बा जिस पे सज के नाज़ करे
दराज़ क़द जिसे सर्व-ए-सही नमाज़ करे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
उर्दू का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
तल्क़ीन सर-ए-क़ब्र पढ़ें 'मोमिन'-ए-मग़्फ़ूर
फ़रियाद दिल-ए-'ग़ालिब'-ए-मरहूम से निकले
रईस अमरोहवी
ग़ज़ल
घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी
सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
हास्य
ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ में वो सज-धज कि बलाएँ भी मुरीद
क़दर-ए-रअना में वो चम-ख़म कि क़यामत भी शहीद
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
देखो ये शहर है अजब दिल भी नहीं है कम ग़ज़ब
शाम को घर जो आऊँ मैं थोड़ा सा सज लिया करो
निदा फ़ाज़ली
नज़्म
काली दीवार
कल वॉशिंगटन शहर की हम ने सैर बहुत की यार
गूँज रही थी सब दुनिया में जिस की जय-जय-कार
अहमद फ़राज़
नज़्म
बरसात की बहारें
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
जंगल सब अपने तन पर हरियाली सज रहे हैं






