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नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार
ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
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ग़ज़ल
काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी
तीनों थे हम वो भी थे और मैं भी था तन्हाई भी
गुलज़ार
ग़ज़ल
अहबाब का शिकवा क्या कीजिए ख़ुद ज़ाहिर ओ बातिन एक नहीं
लब ऊपर ऊपर हँसते हैं दिल अंदर अंदर रोता है
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
मुफ़्लिसी
देते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डाल
नाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभाल














