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ग़ज़ल
वाबस्ता-ए-दाम-ए-होश-ओ-ख़िरद हंगामा-ए-वहशत करना है
ता'मीर के रंगीं फूलों से तख़रीब का दामन भरना है
क़ाज़ी सय्यद मुश्ताक़ नक़्वी
ग़ज़ल
नित रहे वाबस्ता-ए-ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़-ए-मह-विशॉं
फ़िरक़ा उश्शाक़ में अपना यही बाना रहा
हस्सामुद्दीन हैदर नामी
शेर
हादसात-ए-दहर में वाबस्ता-ए-अर्बाब-ए-दर्द
ली जहाँ करवट किसी ने इंक़लाब आ ही गया
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
तसद्दुक़ में ख़ुश-इल्हानी के शा'इर बन गए वर्ना
कहाँ मुमकिन था तुम वाबस्ता-ए-अहल-ए-सुख़न होते