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ग़ज़ल
जौन एलिया
ग़ज़ल
न बायज़ीद, न शिबली, न अब जुनैद कोई
न अब ओ सोज़, न आहें, न हाव-हू ख़ाने
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
दोस्ती का भी तुझे पास न आया हे हे
तू ने दुश्मन से किया मेरा गिला मेरे बा'द
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
'ज़फ़र' वो ज़ाहिद-ए-बेदर्द की हू-हक़ से बेहतर है
करे गर रिंद दर्द-ए-दिल से हाव-हु-ए-मस्ताना
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
किरन सूरज की कहती है फिर आएगी शब-ए-हिज्राँ
सहर होती है 'अख़्तर' सो रहो ये हाव-हू क्या है
अख़्तर सईद ख़ान
ग़ज़ल
याद आता है वो हर्फ़ों का उठाना अब तक
जीम के पेट में एक नुक्ता है और ख़ाली हे