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ग़ज़ल
'मीर' गुम-गश्ता का मिलना इत्तिफ़ाक़ी अम्र है
जब कभू पाया है ख़्वाहिश-मंद पाया है बहुत
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ख़मोशी में निहाँ ख़ूँ-गश्ता लाखों आरज़ूएँ हैं
चराग़-ए-मुर्दा हूँ मैं बे-ज़बाँ गोर-ए-ग़रीबाँ का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
किस लिए कीजे किसी गुम-गश्ता जन्नत की तलाश
जब कि मिट्टी के खिलौनों से बहल जाते हैं लोग
हिमायत अली शाएर
ग़ज़ल
वो था मिरा दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता जिस के मिटने से
बहार-ए-बाग़-ए-जिनाँ थी वजूद-ए-दुनिया था
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ज़िंदगी फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता को पा सकती नहीं
मौत ही आती है ये मंज़िल दिखाने के लिए
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
ज़ि-बस खूँ-गश्त-ए-रश्क-ए-वफ़ा था वहम बिस्मिल का
चुराया ज़ख़्म-हा-ए-दिल ने पानी तेग़-ए-क़ातिल का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं
अपने गुम-गश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं