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ग़ज़ल
अक़्ल-ओ-शुऊर भी हैं क्या उक़्दा-ए-राज़-ए-दहर हैं
रह गए और उलझ के हम सई-ए-कशूद-ए-राज़ में
जिगर बरेलवी
ग़ज़ल
ज़हीर देहलवी
ग़ज़ल
जहाँ कशूद-ए-नवा पर ख़िज़ाँ के पहरे हैं
वहीं बहार-ए-ग़ज़ल-ख़्वाँ है देखिए क्या हो
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश को बाले तक
उस को फ़लक चश्म-ए-मह-ओ-ख़ुर की पुतली का तारा जाने है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए
मुनव्वर राना
ग़ज़ल
'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
हम-आहंगी में भी इक चाशनी है इख़्तिलाफ़ों की
मिरी बातें ब-उनवान-ए-दिगर वो मान लेते हैं