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ग़ज़ल
क्यूँ न वहशत-ए-ग़ालिब बाज-ख़्वाह-ए-तस्कीं हो
कुश्ता-ए-तग़ाफ़ुल को ख़स्म-ए-ख़ूँ-बहा पाया
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
है बहार-ए-रंग-ओ-बू-ए-ताज़ा रू-ए-ख़स्म-ए-जाँ
सालिम आफ़ात-ए-हवादिस से गुल-ए-पज़मुर्दा है
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
ख़ार-ओ-ख़स महरम हैं पुर-फ़न गरचे हम रहे जूँ हुबाब
हम तिरे ऐ बहर-ए-हुस्न आख़िर हवा-दारों में थे
वली उज़लत
ग़ज़ल
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
साअद-ए-सीमीं दोनों उस के हाथ में ला कर छोड़ दिए
भूले उस के क़ौल-ओ-क़सम पर हाए ख़याल-ए-ख़ाम किया