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ग़ज़ल
ख़िश्त-कोबी में किसे फ़ुर्सत-ए-ख़्वाब-ए-ख़ूबाँ
ज़िंदा रहने के तक़ाज़ों ने किया ज़ीस्त का ख़ूँ
ज़िया जालंधरी
ग़ज़ल
दुनिया में कशिश दी कोई मोहलत भी तो देते
इक लम्हा की फ़ुर्सत है कि गुल-बर्ग पे नम हम
रिज़्वानुल्लाह
ग़ज़ल
मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
कोई बात ऐसी अगर हुई कि तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता