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ग़ज़ल
दिल-ए-मर्द-ए-मुसलमाँ में किसी बुत का क़दम आया
मिरी दुनिया में तुम आए कि पत्थर का सनम आया
रियाज़त अली शाइक
ग़ज़ल
बे-बस इतने हुए क्यूँ इश्क़-ए-बुताँ में 'ज़ाकिर'
कुफ़्र बकने लगे इक मर्द-ए-मुसलमाँ हो कर
अब्दुल हकीम ज़ाकिर
ग़ज़ल
दिन को रोज़ा 'ईद शब को है 'अजब शग़्ल-ए-'रियाज़'
रात-भर पीता है ये मर्द-ए-मुसलमाँ आज-कल
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
अगर हो इश्क़ तो है कुफ़्र भी मुसलमानी
न हो तो मर्द-ए-मुसलमाँ भी काफ़िर ओ ज़िंदीक़
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
किया काफ़िर ने काफ़िर 'मेहर' से मर्द-ए-मुसलमाँ को
जनेऊ रिश्ता-ए-तस्बीह दाग़-ए-सज्दा टीका है
हातिम अली मेहर
ग़ज़ल
कल मुझे क़त्ल कर उस दुश्मन-ए-दीं काफ़िर ने
बोला लोगों से ये था मर्द-ए-मुसलमान अज़ीज़
मोहम्मद यार ख़ाकसार
ग़ज़ल
इन बुतों ने मुझ को बे-ख़ुद किस क़दर धोके दिए
सीधा-सादा जान कर मर्द-ए-मुसलमाँ देख कर
अब्बास अली ख़ान बेखुद
ग़ज़ल
किया काफ़िर ने काफ़िर 'मेहर' से मर्द-ए-मुसलमाँ को
जनेव रिश्ता-ए-तस्बीह दाग़-ए-सज्दा टीका है
हातिम अली मेहर
ग़ज़ल
मरजा-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ है वो बुत नाम-ए-ख़ुदा
भेजते हैं उसे हिन्दू ओ मुसलमाँ काग़ज़