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ग़ज़ल
आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ
या इश्क़ की पकड़ कर गर्दन मरोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
है मुद्दतों से तेरे इंतिज़ार में भी इक लहद
भलाई चाहे वाँ तो नफ़्स अपना कुछ मरोड़ तू
गुलज़ार मुरादाबादी
ग़ज़ल
शैतानी पंजा क्या चीज़ एक मुजाहिद तू है 'अज़ीज़'
शैतानी पंजे को मरोड़ वर्ना फिर पछताएगा
अज़ीज़ अन्सारी
ग़ज़ल
ज़रा हदों से निकल के आगे मरोड़ दी जब कलाई उस की
लगा कि जैसे वो कसमसा कर क़रीब अपने बुला रही है
नीलेश नूर
ग़ज़ल
बातें बनाता है वो मिरे दिल को तोड़ के
लफ़्ज़ों के मुँह छुपाता है काग़ज़ मरोड़ के