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ग़ज़ल
गुम-शुदा तन्हाइयों की राज़-दाँ अच्छी तो हो
मैं यहाँ अच्छा नहीं हूँ तुम वहाँ अच्छी तो हो
कफ़ील आज़र अमरोहवी
ग़ज़ल
इल्म-ओ-फ़न के परवानो ये भी क्या क़यामत है
'राज़' को यहाँ कोई राज़-दाँ नहीं मिलता
ख़लील-उर-रहमान राज़
ग़ज़ल
इश्क़ के मुख़्बिर को अपना राज़-दाँ समझा था मैं
रहज़न-ए-मंज़िल को मीर-ए-कारवाँ समझा था में
सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
ग़ज़ल
सुख़न-ए-'राज़' की दी दाद किसी ने आख़िर
शुक्र है बज़्म में कोई तो सुख़न-दाँ निकला
प्रेम नारायण सक्सेना राज़
ग़ज़ल
न कोई मेहरबाँ अपना न कोई राज़-दाँ अपना
जिसे समझे थे अपना दिल वो दिल भी अब कहाँ अपना
मुर्ली धर शाद
ग़ज़ल
था एक राज़-दार-ए-मोहब्बत से लुत्फ़-ए-ज़ीस्त
लेकिन वो राज़-दार-ए-मोहब्बत कहाँ मिला