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ग़ज़ल
मुल्क की सरहदें कहने लगीं रो कर 'अंजुम'
शहर में फ़ौज के दस्ते नहीं अच्छे लगते
अब्ब्दुर्रऊफ़ अन्जुम
ग़ज़ल
ख़ुलूस-ए-दिल से सारी सरहदें मिल जाती हैं 'नजमी'
जहाँ मिलते हैं सब रस्ते वो रस्ता हम ने देखा है
Meem Sheen Najmi
ग़ज़ल
सरहदें हो ख़त्म सारी ख़त्म हो सब भेद-भाव
ख़ूँ से मेरे ऐसा इक नक़्शा बनाते जाइए
आदित्य श्रीवास्तव शफ़क़
ग़ज़ल
जहाँ पर सरहदें दैर-ओ-हरम की ख़त्म होती हैं
वहीं पर नूर-ए-ईमाँ है वहीं राह-ए-यक़ीं निकली