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ग़ज़ल
'बर्क़' उफ़्तादा वो हूँ सल्तनत-ए-आलम में
ताज-ए-सर इज्ज़ से नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ग़ज़ल
जाओ मौजो मेरी मंज़िल का पता क्या पूछती हो
इक जज़ीरा दूर उफ़्तादा समुंदर में अकेला
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
बिस कि हैरत से ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-ज़िन्हार है
नाख़ुन-ए-अंगुश्त-ए-बुत ख़ाल-ए-लब-ए-बीमार है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बरा-ए-हल्ल-ए-मुश्किल हूँ ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-हसरत
बँधा है उक़्दा-ए-ख़ातिर से पैमाँ ख़ाकसारी का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
सरिश्क-ए-सर ब-सहरा दादा नूर-उल-ऐन-ए-दामन है
दिल-ए-बे-दस्त-ओ-पा उफ़्तादा बर-ख़ुरदार-ए-बिस्तर है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मोहर-ए-तग़य्युर इस धज से आफ़ाक़ के माथे पर चमका
सदियों के उफ़्तादा ज़र्रे हम-दोश-ए-अफ़्लाक हुए
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
मैं हूँ नादान दूर-उफ़्तादा दानाई के दीवाँ से
न सानी हूँ सहाबी का न हम-बज़्म-ए-बयाज़ी हूँ
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
ग़ज़ल
मैं हूँ बर्ग-ए-ख़िज़ाँ-उफ़्तादा मैं मरदूद दहक़ाँ हूँ
गिरा हूँ उन की नज़रों से उठा ले जिस का जी चाहे